#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

—:दृष्टि:—

 

पंछी उड़ चल नील गगन में, व्यवधानों का घेरा है।

डिम्ब  लिये  शैतान  नबेला, कहता  मेरा – मेरा है।।

 

तन्मयता की चादर ओढे़, दिव्य  किरन  मुस्काई है,

जलन स्वार्थ परमार्थ सम्हाले,वसुधा की अँगनाई है,

वातसल्य अभिनय में ढूबा,चहुँदिश खड़ा लुटेरा है–

 

हरियाली की कुसुम कोशिका,मौसम से घबराई है,

रश्मि  रसायन  पूर  माधुरी, समझ  रही चतुराई है,

लामबन्द सिन्दूरी किरणें, सॉवल केश घनेरा है—

 

लस्त त्रस्त नदियों की धारा,दूषित दुखद कुपोषण से

नेह लिये शबनम की बूँदें,जल विहीन अन्वेषण से

हवा बिषैली क्रन्दन करती,बन्धन लिये सपेरा है—

 

रुख सूख ललिमाऔ गरिमा,पतझड़ की अंगडा़ई से

जीत सका न कोई क्षिति पर,जहरीली रुसवाई से,

“भ्रमर”लिये अभिलाषा अग्नि,ढूँढो नया बसेरा है—

 

रचयिता :–विजय नारायण अग्रवाल “भ्रमर”

 

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