#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

-:भोग:–

 

जठर अग्नि का बढा़ प्रयोग।

यही से मानव करता भोग।।

 

करम को भूले सब मतवाले,

रहम – शरम में  पडे़ हैं ताले,

नष्ट  हो  रहे धरम  के प्याले,

भटक गया भौतिक सहयोग–यही

 

मन्दिर मस्जिद औ गुरुद्वारा,

नम्र  मृदुल  गंगा  की   धारा,

मौलि शिरोमणि शुष्क किनारा

दूषित अञचल प्रौढ़ कुयोग—यही

 

जब्त  हो  रही सजल नर्वदा,

पेड़ – पुष्प  पर बढी़ आपदा,

ईश  बचाओ  प्रकृति संपदा,

धूम – धाम  से  बढ़ा  प्रयोग—-यही

 

नारी   में  बढ़   रही  बेदना,

थपकी  से  सो  रही अर्चना,

बाधित मन की श्रवन चेतना,

भुवन  में  लागा  ऐसा  रोग—-यही

 

जीव – जन्तु को रहा बिलोय,

धरम – करम अज्ञान में सोय,

जनम   कृतारथ   कैसे  होय,

‘भ्रमर’ को कहते बिषयी लोग —

भावुक  चन्दन  लिये  वियोग—-यही

 

विजय नारायण अग्रवाल ‘भ्रमर’

 

 

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