#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

(सबके बस की बात नही)

 

गुस्सा आना स्वाभाविक ,

पर उसपे काबू रखना

सबके बस की बात नहीं।

 

रूप रुपइया चॉंदी सोना,

दुगना  तिगना करना

सबके बस की बात नही ।।

 

तेरा मेरा कहते करते

जीवन सारा बीत रहा है

गधेको अपना सगा बनाना

सबके बस की बात नहीं —–

 

बड़बत्ती ने किया निगाेड़ा,

ये  लोग मुझे बतलाते हैं

हार गले का फांस बनाना,

सब के बस की बात नहीं ——

 

दुनिया अपना दर्द सुनाती,

पर सुनने से  घबराती है

रगड़ा- झगड़ा  दूर कराना,

सबके बस की बात नहीं —–

 

सिंघासन पर राजा हो या रानी,

फ़र्क नहीं कुछ पड़ता है

हर मुशकिल में साथ निभाना,

सबके बस की बात नहीं —-

 

जीवन की अनमोल व्यवस्था,

दशा -दिशा में अंकित है

पंछी जैसा उड़ के दिखाना,

सबके बस  की बात नहीं —–

 

जानकार नित बोध कराते,

बिष अौ बिषय के अंतर को,

बीर भूमि को गले लगाना,

सबके बस की बात नहीं

 

ओम् सहारे हर मजहब है,

सत्य नियम को ले करके,

काल चक्र  को रोके  रखना,

सबके  बस की बात नहीं —–

 

रमण बिषय की बात अलग है,

ध्यान से देखो दरपन में

“भ्रमर “चाह का मालिक बनना,

सबके बस  की बात नहीं ।।

 

विजय नारायण अग्रवाल ‘भ्रमर’

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