#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

एक सत्य:–

मुक्तक:–1

नहिं कवि मैं नहिं चतुर सुजाना,

नहिं कविता के अर्थ  को जाना,

लिखा  भाव सम्मोहित  मन से,

‘भ्रमर’चित्त का कौन ठिकाना।।

2

इसमें अपना कुछ भी नही है,

झूठ नही बतलाता हूँ,

जो कुछ  पाया  इष्ट देव से ,

उन्ही को मैं दुहराता हूँ,

उसने हमको ‘भ्रमर’ बनाया,

ज्ञान ध्यान की दीक्षा दी,

इसीलिये जब मन इठलाता,

चिंतन और बढा़ता हूँ।।

3

ताकि जग में उसकी प्रतिभा,

सूरज बनकर भोर करे,

जनजीवन भी भावुक होकर,

रस को अपनी ओर करे,

मिले मार्ग उस परमपिता का,

‘भ्रमर’ चेतना अनुपम हो,

लिये जौहरी पुष्प औ माला,

पग-पग प्रभु का शोर करे ।।

शेर:–

हर मकॉं पे गौर करना,

कुछ न कुछ मिल जायगा,

जब अक़ीगत से भरी,

होगी ये तेरी बन्दगी।।

विजय नारायण अग्रवाल ‘भ्रमर’

 

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