#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

-:मिली छॉंव श्री राम की:–

 

गुमसुम गुपचुप रहते क्यूं ,

जब छॉंव मिली श्री राम की ।

रूप रूपइया दंभ पालकी,

सब वहॉं नहीं कुछ काम की ।।

 

नाम रूप को हृदय बसा लो,

तुम संत दु्वारे जा करके,

नर -तन में है बिषय पिटारा,

जग रस माया घनश्याम की —-

 

कर्म-धर्म जब पावन होता ,

दैविक इच्छा पुण्य लुटाती,

देख विभव कीअभिलासा

गति मुदिता परिणाम की —-

 

वचनों  में माधु्रता भर के,

ज्योति धरा पर आई  है,

जीवित रखना स्वर स्पंदन,

तुम कृष्णचंद्र के धाम की —-

 

पंडित  मुल्ला  फादर  पंथी ,

धर्म के सेनानायक पर,

थकन कभी न आती जिसको,

वह भक्ती है बाम की ——

 

खाते-पीते जतन-जोग कर,

वह सहज राह समझाय रही,

ललक बढ़ाकर प्रभु चरनों में,

माला फेरो निष्काम की ——

 

सार मिला सत्कार मिला,

औ मिली प्रेरणा किरणें,

नित्य “भ्रमर”आराधन करके ,

तुम सेवा करो गुलाम की,

और प्रौढ़ अनुशाशन रखके,

बस मूरति गढ़ो सकाम की ।।

 

विजय नारायण अग्रवाल ‘भ्रमर’

 

 

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