#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

:भजन:-(चिन्तन पुकार)

 

ममता भटक रही हर बार।

अरे मैं कैसे करूँ पुकार ।।

1

मन भी मैला  तन भी मैला,

मुखसे निकले झाग बिषैला,

चिंतन  धारा  जुड़  न  पाये,

जोड़ूँ बारम्बार—अरे् मैं—-

2

श्रद्धा क्षमता घटी  नही है,

आराधन  से दुखी  नही है,

पर लौकिकता बोध न पाती,

बैभव भरा दुवार–अरे मैं—

3

संसाधन मेंं बढी़ चपलता,

बिषय वासना रथ पे चलता,

फँसी इन्द्रियां सम्मोहन से,

आकुल भाव विचार-अरे मैं–

4

मैं  भी  तेरा  तू  भी  मेरा,

जीवन  है एक  रैन बसेरा,

बदली राग विराग से रशमी,

यौवन बना कुदार–अरे मैं–

5

अन्दर  मेरे  मैल  भरा है ,

ऊपर  मेरा  रूप  सजा है ,

ज्ञान चक्षु भी द्वंद करत हैं ,

करके बन्द किवॉंर–अरेमैं–

6

काम क्रोध की बहती धारा,

लोभ – मोह ने उसे सचारा ,

मद  में ढूबा  पाल  हमारा,

छाया है अंधियार –अरे मैं–

7

जीवन  को  बिषयों ने घेरा,

यमदूत लगावैं जब तब फेरा,

माया  फाँसे अपने  चक्कर,

ना देती छुटकार –अरे मैं—

8

बडी़ बिषमता भौतिक युगमें,

साथी  नहीं  है कोई  दुख में,

दुर्योधन  की  मनो  कामना,

घुटके भइयाचार–अरे मैं—

9

हे मन मोहन जग आधार,

नीचे जल बना चक्राकार,

डोल रही है’भ्रमर’की नइया,

छूट गयी पतवार –अरे मैं–

 

रचयिता प्रेषक:–

‘भ्रमर’

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