#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

:ब्रह्मान्ड दर्शन:–

 

सम् भावों को देने वाला,

एक छत्र (आकाश) है।

त्याग मूरती (धरती) माता,

पूरन करती आस है।।

1

यदि नव मन की अंत:किरणें,

यज्ञवेदि दिग्पाल दे,

प्रश्न नही है कोई आकर,

भौतिकता को चाल दे,

(पवन) सृष्टि रंग भरने वाला,

आत्म ज्योति उल्लास है—-

2

कारण जाकर तुम खुद पूछो ,

पुलकित सृजन सहेली से,

शशिग्रहअगनित नमन सितारे,

खोई हुयी पहेली से,

रसमय सुन्दर शोणित यौवन,

(अग्नि)मयी विश्वास है—-

3

जी की तृष्णा अश्रु भिगोई,

जगह जगह पर दिखती है,

शुचिता उसकी कलुषित एैसी ,

विन व्याहे ही फलती है,

कान्त ऐंठ औ कामिन कौशल,

नहीं (जल)धि के पास है—–

4

क्यूँ ना नित आनन्द उठायें,

गंगा -जमुना नीर से,

लक्ष वीथिका पोषित करके ,

भौतिक-भूत शरीर से,

शरन”भ्रमर”उस व्योमपाद के,

जो रचता अनुप्रास है—–

 

सम् भावों को देने वाला,

एक छत्र आकाश है।

त्याग मूरती धरती माता,

पूरन करती आस है।।

 

ईश्वरी कृपा का आनन्द लूटें?

 

रचयिता प्रेषक:–

विजय नारायणअग्रवाल’भ्रमर’

 

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