#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

दर्पण:–

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बदला है प्यार मौसम,

बदली हैं संविदायें।

दरपन सवाल करता,

कैसे उन्हें छिपायें।।

 

रीता है ग्यान दर्शन,

भक्ती औ भावना से,

विनयी मल्हार जोती,

गीता की कामना से

शालक बनी हैं सारी,

दुनियाबी वासनायें–दरपन

 

लशकर में एक सब हैं,

इन्सानियत के भाई,

दीपक से लव निकल कर,

ज्यों आसमॉं में छाई,

क्षिति पर कुढ़न प्रवाहित,

प्यासी हैं आत्मायें –दरपन

 

तन पर रसील कपड़ा,

चेहरे पे भोलापन है,

विदुषी का रूप धारे,

प्रस्तावना लगन है,

साधू किसे कहें हम,

बोझिल शिखर रिचायें-दरपन

 

ललकार औ कहर से,

छूटा है आशियाना,

बागी”भ्रमर” को कोई,

देता ना आबोदाना,

मातम मचा शहर में,

करुणा कहॉं सुलायें—दरपन

 

दरपन सवाल करता,

कैसे उन्हें छिपायें।।

बदला है प्यार मौसम,

बदली हैं संविदायें।

 

‘भ्रमर’रायबरेली

 

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