#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

नारी दशा-दिशा:–

 

बदल गया संसार का यौवन ,

बदल गया परिधान रे।

दशहुँ दिशायें धूल-धूसरित,

छोड़ गया तूफान रे ।।

 

रीत निभाती मोहक कलियां,

दामन की हकदार हैं,

बिषयी जन अरमान सजाये ,

दिनकर से बेजा़र हैं,

शाश्वत तन की अधम कल्पना,

पगला नशा जवान रे–बदल–

 

लख चौरासी सबको जाना,

धरम में भइयाचार है,

दीन-दुखी या राजा-जोगी,

सबमें एैंठ सवार है,

क्षिति पर तारक पावन गंगा,

शोषण से हैरान रे–बदल–

 

तमस बढा़अस आज जगत में,

बचा न कोई जीव है,

विदुर भला क्या उसे संवारे,

डोल रही  हर नींव है,

शाशन हिंसक करने वाला , विकल प्रबल शैतान रे -बदल-

 

लज्जा खोती प्रौढ़ सुकन्या,

नयनों में सुरमायी है,

भोडी़ उसकी काम-कला,

औ बिषधर सी अंगडा़ई है,

कौन सुधा दे आज ‘भ्रमर’को,

बैभव विभव बिषान रे—

 

बदल गया संसार का यौवन ,

बदल गया परिधान रे।

 

“भ्रमर” रायबरेली

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