#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

जब कामना हृदय की बलभद्र होती है,

तब वासना  बिषय के संसर्ग बोती है,

पर”भ्रमर”उसको नही इस बात का पता

 

कि साधना में साध्य की अभिव्यक्ति सोती है,

कि धारणा अनुरक्त की छल्ले पिरोती है,

कि अस्मिता भवतत्व की परिपक्व जोती है,

कि धर्मिता अमरत्व के पल्लव संजोती है

कि कल्पना से आत्म की अणुशक्ति खोती है

 

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