#Kavita by Vijay Narayan Agrwal

श्री शिव वंदना :–

 

मन्द बुद्धि के सुखद सहारे,हम तो औघड़ जानी हो ।

हाथ दयालू सिर पर रख दो, लोग कहें बरदानी हो।।

 

करम लेख के मेटन हारी ,तुम्हरा अजब विधान है,

बिषधर तेरे नयन दुलारे ,माया अन्तर ध्यान है,

सुन्दर मुखड़ा चॉद सा टुकड़ा,अमरनाथ बर्फानी हो, — हाथ दयालू—–

 

धारण करके गंग शीश पर, रथ को दिया सहारा है,

कन्ठनील भगवान कहाते ,पुरुखों को भी तारा है,

रचते रोज कहानी जग में,बने हुये अग्यानी हो– – हाथ दयालू—–

 

शरणागत की लाज बचाने ,रूप अनेकों धारे हैं,

रणभेरी सा डमरू बजाकर ,पहुंचे गोकुल द्वारे हैं,

मात विलोकत सजल नयन से, क्षमता सकल भुलानी हो – – हाथ दयालू—

 

सुर मैं व्यापी ऐकै विनती, लाल गनेश को जीना है,

धाम बना कैलाश निरुत्तर, बढ़ता हुआ पसीना है,

कह दो कोई बात अधर से ,तन कै मिटै गिलानी हो – – हाथ दयालू—–

 

रखना प्रभुजी लाज तनय की, कुंठित प्रेम की माला है,

सियाराम की विषद छावनी ,”भ्रमर” ही भूरा काला है,

प्रान प्रिय हनुमान जी सुन लो,तुम तो अन्तर्धानी हो – – हाथ दयालू—–

 

मन्द बुद्धि के सुखद सहारे,हम तो औघड़ जानी हो ।

भ्रमर–+919453510399

 

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