#Kavita by Vijaya Narayan Agrwal

:सत्य एक दर्पण:–

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सुख-दुख मितवा राग के बादल,रूप-धूप सुरताल जी ।

मिलते सदा भाग्य के लेखे,रखना इन्हें सम्हाल जी ।।

 

त्रास किरन संकीर्तन करके,रोज तोड़ती हिम्मत को,

नमन सुमन सा धीरज रखकर,भगत संवारो अस्मत को,

कनक सजीवन कहॉ सोधता,छाया बिषय भुवाल जी—-सुख दुख—–

 

न्याय दूर चौरासी योजन,सुरति सुहावन क्रन्दन की,

दशों दिशायें पुल्कित पुष्पित,विश्व मित्र अभिनन्दन की,

विनय- नेह- स्नेह भुलाना,योग बना चन्डाल जी ——सुख दुख—–

 

नरबस कुन्ठा सोंच रही थी, कैसी त्रिगुणी माया है,

पंछी को संदेह ने जकड़ा, हर संकल्प बिषाया है,

वसुधा को क्या ज्ञान नही है,निधि उपमा कंगाल जी—-सुख दुख——

 

तस्बीर देख कर मरघट की,भौतिकता मन चली हुयी,

जीवन में क्या शेष बचा है,घडी़ घिनौनी तुली हुयी,

रमक रहा प्रतिकारी ऑचल,साया “भ्रमर” कृपाल जी—सुख दुख मितवा राग के–

 

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