#Kavita by Vikash Raj

जाने जाँ मैं दूर तुमसे इस कदर हो जाऊँगा ,

तुम तो क्या, सारे जहाँ से बेखबर हो जाऊँगा ।

 

फिर भी मेरे साथ में आशीष है आकाश भर ,

तुमने तो बोला था कि मैं दर बदर हो जाऊँगा ।

 

था अभी खामोश जो बज्मे सुखन में तो मियाँ ,

तुमने क्या सोचा था कि मैं बेअसर हो जाऊँगा ।

 

तुम अँधेरे से कभी दहशत न करना दोस्तों ,

रात आने दो जरा मैं भास्कर हो जाऊँगा ।

 

फासला रखिएगा मुझसे आप वर्ना आपका ,

देखते ही देखते लख्ते जिगर हो जाऊँगा ।

Vikash Raj

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