#Kavita by Vikram Gathania

अपने इसी समय में

आजकल की स्त्री
इस तरह क्यों सोचे
कि उसका अपना मर्द
कैसा भी है
आखिर उसका अपना है
उसकी आदत जैसी भी है
उसका करना भी क्या है
कैसी भी स्थिति है
निभानी तो है
स्त्री तो
सदियों से ही
ऐसा समझौता करती आई है
अब क्यों करे
ऐसी सोच
शायद ही सब स्त्रियों की हो
पर कुछ तो स्त्रियाँ हैं
कुछ कवयित्रियाँ हैं
पर संदेह है
उनके अपने घर में
वे वैसी हैं!

हो सकता है
वे उच्च वर्ग की हों
उनके घर वैसे बनते हों
वैसे चलते हों
पर सबके नहीं
बनते वैसे
चलते वैसे !

अतीत की स्त्री का हवाला देकर
वर्तमान के पुरुष को
संबोधित करती है
जब कोई कवयित्री
कि युगों युगों से
दासी है तुम्हारी
अब वह दासी नहीं रह सकती
अब वक्त बदल गया है
अब तो मित्र बनकर ही रहना  है
पर क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि वह वर्तमान का हवाला लेकर
वर्तमान के पुरुष को संबोधित करे
कि वह रहना चाहती है
मित्र बनकर ही
दासी शब्द
घसीटे न बीच मे?

पीढ़ी दर पीढ़ी
घसीट कर भी
क्या स्त्री को पुरुष हो जाना है?
प्यार से ही
हर स्त्री को पुरुष होना है
अपने इसी समय में!

विक्रम गथानिया

189 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.