#Kavita by Vikram Gathania

वह सेवक वह जैकी
मुझे उसकी आदत नहीं थी
ऐसा ही लगता रहा था
जब भी निकलता था मैं
घर से
वह मर्जी से अपनी
छोड़ आता था मुझे
एक सीमा तक
लेने भी आता था
मैं रहता था
अक्सर मगरूर ही
शान में अपनी
वह पड़ा रहता था
दरवाजे पर
मेरी शान में
वह कुत्ता
वह सेवक
वह जैकी !
कहीं कोई
ऐसा आभास भी नहीं था
उस दिन
उसकी मृत्यु के दिन
वह खाया पिया
अघाया
सोया रहा था सारा दिन
कि अवांछित थोड़ी सी
किसी आवाज़ पर
आसपास की
वह हो जाया करता था
चेतन एकदम से
उस दिन भी
कर्तव्यनिष्ठ हो
वह भागा था
बंदरों के पीछे
फिर वापस नहीं आया था
पहुँच गया था वह
बाघ के मुँह तक
बास लगाते
वह शिकारी
वह जैकी !
अब लगता यही है
वह कहीं से आ जाएगा
नज़र तलाशती है उसे
इसी बीच
याद आती हैं
उसकी अदायें चंचल
उसके देखे गये रूप सब
उनका आभास होता है
उन सब जगहों पर
होते ही दृष्टिपात !
मौत एक कटुतम सच्चाई
इसलिए होती है
कड़वी लगती है
सहने में
किसी प्रिय की !
मृत्यु भी क्या है
भ्रम पैदा करती है
जिस्म मिट जाता है
असली सा कुछ
कहीं तो होता है !
वह जैकी
सदा ही सम था
सब सदस्यों से घर के
वह एक आदर्श सदस्य था घर का
मृत्यु से उसकी
निश्चित ही
सिद्ध यही होता है
एक बड़ा संकट  था
घर पर
जो वीत गया था उस पर
वह सेवक
वह जैकी !
घर तो एक घेरा होता  है
घेरे के बाहर
जैकी सा कोई
अपने आप ही
पहरेदार हो जाता है
जान पर अपनी
खेल जाने की
फितरत होती ही है जिसकी
ऐसा ही था
वह बलिदानी
वह जैकी !
याद में जैकी की
पालना ही है
एक छोटा सा
एक कुत्ता
बिजली पंखे की सुविधाएँ भी
प्रदान की जाएँगी
जिनसे बंचित रहा था जैकी
अपने कुत्ता घर में !
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