#Kavita by vinay bharat sharma

पिताजी –

कभी वो मेरे पास आते
हाल पूंछते गले लगाते
कभी कभी अतिश्योक्ति कर
मेरा जग को नाम बताते
मैं पहले तो डरने लगता
सोचने लगता
कभी कभी जब मैं गिर पड़ता
दौड़ दौड़ कर
फिर वे आते
मुझे उठाते
गले लगाते
हाथ से अपने मेरे पैरों पर
दवा लगाकर
मुझे सुलाते
कभी कभी जब जल्दी होती
मेरे जूते पोलिस करते
वस्त्र प्रेस कर
मुझे सजाते
कभी कभी
जो
मैं चिल्लाता
माँ को
फिर से
डांट लगाते
मुझे समझते
मुझे मनाते
खुद वो सूखी रोटी खाकर
मुझे अनेक
पकवान खिलाते
कभी कभी यूँ लगने लगता
मानो मैं कोई स्वर्ण रतन हूँ
या फिर हूँ
चाँदी का खिलौना
जिसको लेकर
बुनते हैं
तो
अपना अनुपम
स्वप्न सलोना
जब जब मैं
पैसे लेता था
कभी मना वे नही कर पाते
खुद अपनी इच्छा और श्रम से
मुझे सुखों की सैर कराते
कभी कभी जब
बारिश होती
खुद भीगते
मुझे बचाते
सर दर्द की एक गोली
खुद न खाकर
मुझे खिलाते

हृदय विशाल इतना था उनका
जब जब गलती करता था मैं
हलकी सी बस डांट डपट
और कभी कभी
फटकार लगाते
फिर मेरे रूठे होने पर
रात रात भर
आंसू बहाते
और मैं उनको
देखता रहता
इकटक यूँ ही
देखता रहता
लगता हैं मुझको
कभी कभी
जिस दिन
साथ नही होंगे
कैसे
जी पाउँगा
जीवन
जब मेरे पास नही होंगे
चिल्लाता हूँ
चीखता हूँ मैं
कभी कभी
उनकी बातों पर
चरण भी न छुए है मैंने
कभी किसी भी त्योहारों पर
फिर भी आत्मा उनकी कहती
दीर्घ जियो और सुखी रहो तुम
मैंने जो भी उनसे चाहा
दुगना लाकर मुझे दिया
फिर क्यूँ मैंने यूँ उनको
बुढ़ापे में छोड़ दिया
क्यों भूला हूँ
उनका जीवन
अपना बचपन उनका
वह श्रम
याद करूँ तो
आँखों में
आंसू अब आते जाते हैं
जो कभी मखमली बिस्तर देते
आज घांस पर सो जाते हैं
मुझे यूँ बैड पर सोता देख
आज भी वो खुस हो जाते हैं
मैं
इतना निर्मोही क्यूँ हूँ
क्यों उन्हें समझ नही पाता हूँ
क्यों मैं बार बार झगडा कर
उन्हें ह़ी नीचा दिखता हूँ
क्यों वे
मुझे कुछ कह नहीं पाते
क्यों
सब कुछ सुनते रहते हैं
शायद पुत्र की सोंच बदले
पिता गलत कभी
नही होते हैं

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