#Kavita by Vinita Badmera

तुम

 

मैं तो निशदिन तुम्हारे  ही

चेहरे को पढ़ना चाहती  हूँ।

नहीं सीखना   चाहती    हूँ

तुम्हारे अलावा कोई अक्षर।

 

जानना चाहती हूँ सिर्फ

तुम्हारे प्रेम की वर्णमाला

उतरना  चाहती  हूँ तो

तुम्हारे शब्दों की गहराई में।

 

समेटना चाहती हूँ  सदैव

तुम्हारे ही यादों के पन्नों को,

लिखना चाहती हूँ   कविता

जो तुमसे शुरु हो और

समाप्त भी तुम पर हो।

 

अपनी कल्पना में रंगना

चाहती हूं तुम्हारे ही ख्वाब।

और मुस्कुराना चाहती हूँ

तुम्हारे संग बीते   समय

का     स्मरण  करके।

 

इस तरह तुम्हारे समीप आ

सांसो मे समाना चाहती हूँ

और अहसास करना चाहती हूँ

तुम्हारी प्रीत की   महक को

एक बार नहीं, बार  -बार।  वीनू

 

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