#Kavita by Vipul Sharma

देखना चाहता हूँ
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देखना चाहता हूँ तुम्हे
हर लम्हा हर घडी
अनवरत
देखना चाहता हूँ
वो नेह मेरे लि़ये जो
भरा है तेरी आंखों मे

वो अपार नेह, जिसमे
शामिल हूँ मैं
तेरा बनकर तेरे लिये
कहाँ नही दिखायी देती हो
तुम मुझे

कब नही होता है
एहसास तेरा
नदी की कलकल मे
सूरज की रश्मियों मे
सुबह की बहती
मंद मंद पवन मे
कहाँ नही दिखायी देती तुम

जाडे मे फैलती घुंध मे
ठिठुराती ठंड मे
गिरती हुई ओस मे
सवेरे हरे पत्तो पर
और सूरज की
रश्मियों से चमकती
शबनम मे
कहाँ नही दिखायी देती हो

बारिश की बूंदों मे
गिरती बूंदो की टिप टिप मे
बारिश से भीगते बदन मे

पूस की रात मे
सांय सांय करती हवा मे
जेठ की गरम हवाओं मे
गर्मी मे टपकते
पसीने की बूंदों मे
कहाँ नही दिखायी देती हो

सांझ के सिन्दूरी
सूरज मे
औऱ धीरे धीरे फैलते
अन्धेरे मे
चन्द्रमा की शीतल
किरणों मे
कहाँ नही दिखायी देती हो

कहाँ नही होता
तेरा एहसास
बताओगी क्या मुझे तुम
हाँ, हर कहीं
महसूस करता हूँ तुम्हे ही

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