#Kavita by Vishal Narayan

-” बोलो विधाता …”–

 

माना कि बहुत विधाता हो

सम्पूर्ण ब्रहाण्ड के निर्माता हो

पर क्या मिला तुमको

एक बालक को बेघर कर के

बोलो विधाता

मैं रोउं किसके कंधे सर कर के….

 

जैसे सारे धरती पर आते हैं

मैं भी धरती पर आया था

पर तुम्हीं बताओ मुझको

संग में पाप कौन से लाया था

कहने को मैं जिंदा हूं

पर जीता हूं रोज मर मर के

बोलो विधाता

मैं रोउं किसके कंधे सर कर के….

 

बहुत की इच्छा तो थी न मेरी

तुमने अंतस तक का प्यास दिया

नदि झरने कब चाहे थे मैंने

मुझको मरुस्थल सा आकाश दिया

अब जाऊं तो कहां जाऊं

अपनी आंखें तर कर के

बोलो विधाता

मैं रोउं किसके कंधे सर कर के….

✍–” विशाल नारायण “

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