#Kavita by Vishnu Pratap Chauhan Vish

देश की स्थिति पुनः गर्त में जाती हुयी प्रतीत हो तब ऐसी ही पंक्तियाँ जन्म लेती है..मेरी नवीन रचना..

.(सम्भव नही)

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सुन ले फ़क़ीरे जेबो बाले….काली धूप तुम्हारी थी…

भूखे-बोझिल, जीवित चेहरों में…तुमने उम्मीद उतारी थी ।

तुमने उनके ख़्वाबों को…. कितने वादे दे डाले…

लिखने को नयी कहानी…सादे काग़ज़ दे डाले…

दे डाला ज़िम्मा उनको… तुम इतिहास बनाओगे…

अपना एक क़दम उठाकर…नये क्षितिज पर लहराओगे…

उनके ध्वज बाहक थे तुम… तुमने अलख निखारी थी…

भूखे-बोझिल, जीवित चेहरों में…तुमने उम्मीद उतारी थी ।

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लाचारी के तमग़े को……मज़बूती देना जब था…

घर जिन्होंने छोड़े थे अपने….उनको देना उनका सब था

तब तुमने पैर खींचकर…. बापस मायूसी दे डाली….

करके झूठे वादे और क़समें…नयी उदासी दे डाली …..

अधर्म अंन्याय के धागों में …घोटालों के मोती पेरे…

ग़रीब किसानो को लूटा….अड़ानी-अम्बानी के माले फेरे..

ना कोई काला धन… तुम देश में ला पाए ….

रोज़गार के नवी तरीक़े भी…. तुमने तो ना जन्माये…

ना देश की बेटी की इज़्ज़त…. साये में तुम्हारे रक्षित है…

धरती माँ के हृदय सी गहरी… हर माँ फिर से लज्जित है….

तुम्हारी गीदण हुंकारो में… शायद झूठी ख़ुमारी थी ….

धर्म हमारा रक्षित होगा….खोखली ललकार तुम्हारी थी…

सुन ले फ़क़ीरे जेबो बाले….काली धूप तुम्हारी थी…

भूखे-बोझिल, जीवित चेहरों में…तुमने उम्मीद उतारी थी ।

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सत्तर सालों से दंशो को….सीने पर हमने झेला…..

हमने अपनी नस्लों को….ग़लत तराज़ू पर तौला….

सोचा था तुम अपने वादों पर… खरा उतरना जानते होगे…

सचमे हिदं धरा को मेरी… मैय्या हृदय से मानते होगे…

पर तुमने भी बेमानी से….देश खोखला कर डाला…

पहले से गहरे गड्डो का….अर्थ भी गहरा कर डाला…

कर डाला बेदम सरहद को….दुश्मन से वीरों के शीश कटाये…

बातें कंरने बाले कराँची की…सीमाँपार ना जा पाए…

ना ला पाये लूटेरे भारत के…बापस भारत भूमि पर…

कुत्तों – बहशी , दरिंदो से… बच्चियों को ना बचा पाए…

बातें कंरने बाले कराँची की…सीमाँपार ना जा पाए…

देश को दुनिया में ऊँचा करके…बुलेट ट्रेन तुम लाओगे….

एक दिन भारत की ध्वज पताका…सौराष्ट्र में लहराओगे…

ऐसा कुछ तुमसे सम्भव ही नही था…ना कौड़ी भर तुम में ख़ुद्दारी थी..,

झूठे वादे करने की… शायद तुम्हें कोई बीमारी थी…

सुन ले फ़क़ीरे जेबो बाले….काली धूप तुम्हारी थी…

भूखे-बोझिल, जीवित चेहरों में…तुमने उम्मीद उतारी थी ।।

तुमने उम्मीद उतारी थी ।। -।।

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बड़ी बिडंबना है कि , जिस नेता से भारत भूमि को शहस्त्र उम्मीदें थी … वो अपने झूठे और खोखले वादों को सच साबित करने में इतना व्यस्त है , की सचमे आर्थिक और देश की निचले स्तर की समस्यायो से उसे कोई मतलब नही । देश की परिस्थिति शायद अब बदलना ,”सम्भव ही नही ।”

विष्णु प्रताप सिंह चौहान (विष) मो. – 8006_43/83_7411.

 

 

 

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