#Kavita by Vishnu Pratap Chauhan Vish

‘ व्यथित प्रेम”

 

मन की व्यथा है कि , कोई ज़ोर चलता नही ।

समझाने पर भी , कोई और समझता नही…।।

मेरे वादे मैंने निभाये तन्हा….

मुद्दतो तक एहसास में इंतज़ार किया….

पर उसकी आँखो की स्याही में , मैं अब तिनका भर तक उलझता नही ।। – ।।

जाने की तो खता उसकी थी , उसका फ़तवा ए बेवफ़ाई था ।

और मैं जियूँ उसके बिन , मुझमें ऐसा कोई मज़दा नही ।।

मन की व्यथा है कि , कोई ज़ोर चलता नही ।

मेरे समझाने पर भी , कोई और समझता नही…।। – ।।

ख़ैर मैंने मान लिया , मैं ही ग़लत था…

वो ज़मीन थी स्थिर , मैं बदलता फलक था ।

वो मंज़िलो की तलाश में , मुझे एक छांव भरा पल मानती रही ….

उस पल को मोहब्बत समझना ही बेमतलब था ।।

ख़ैर मैंने मान लिया , मैं ही ग़लत था…।।-।।

अब भूलजाऊँ उसे , तो मैं उत्तरी ध्रुव हूँ ।

जहाँ यूँ ही कभी सूर्य ढलता नही…

मेरे प्रेम नश्वर को शिव से जोड़ दिया अब मैंने ।

तन्हा दर्द उसके बिना क्यूँकि , अब मुझसे सँभलता नही ।।

मन की व्यथा है कि , कोई ज़ोर चलता नही ।

समझाने पर भी , कोई और समझता नही…।।

मेरे वादे मैंने निभाये तन्हा….

मुद्दतो तक एहसास में इंतज़ार किया….

पर उसकी आँखो की स्याही में , मैं अब तिनका भर तक उलझता नही ।। – ।।

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-प्रेम की कमज़ोर पड़ी गाँठ जब ढीली पड़कर खुल जाती है

फिर छूटते हुये रिश्ते बेसुध निर्जीव मोटर कार की तरह दूर अनंत , खायी में गिरते ही चले जाते है । जो ऐसी दूरियाँ पैदा कर देते है कि , इंसान समझकर भी “अपने आधे हिस्से से मिल नही पाता ….।

बीते क़िस्से में घुल नही पाता ….।।”

मेरी नयी रचना …( सम्भव नही ) जल्द ही ।

विष्णु प्रताप सिंह चौहान (विष )

मो. 8006437411…..

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