#Kavita by Vivek Dubey Nishchal

— आँख आँख नीर

 

अब तो आँख आँख नीर बहाती है ।

ग़म के बादल से छाई अँधियारी है ।

 

टूट रहीं है सीमा पर डोरे जीवन की ,

दुश्मन की गोली चुपके से आ जाती है ।

 

राख हुए सपने यौवन मन के ,

डिग्री को दीमक खा जाती है ।

 

अहं भाव के मकड़ जाल में ,

मंदिर मस्ज़िद उलझीं बेचारी है ।

 

लिपट रहे अँधियारे उजियारों से ,

अपनो की अपनो से सौदेदारी है ।

 

गहन निशा हर दिन कुंठाओं की ,

दिनकर को भी ढँक जाती है ।

 

राह नही सूझे कोई अब तो ,

राहें राहों में उलझी जाती हैं ।

 

तारा भी न चमके भुंसारे का ,

निशा गहन की ऐसी सरदारी है ।

 

अब तो आँख आँख …

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