#Kavita by Vivek Dubey Nishchal

1– माँ

ममता जब जब जागी थी ।

माता की टपकी छाती थी ।

दे शीतल छांया आँचल की ,

माता सारी रात जागी थी ।

 

देख अपलक निगाहों से ,

गंगा यमुना अबतारी थी ।

स्तब्ध श्वास थी साँसों में ,

अपनी श्वासों से हरी थी ।

 

आँचल की वो छाँव घनी थी।

दुनियाँ में पहचान मिली थी ।

छुप जाता तब तब उस आँचल में,

जब जब दुनियाँ अंजान लगी थी।

 

उस आँचल की छोटी सी परिधि से ,

इस दुनियाँ की परिधि बड़ी नही थी।

हो जाता “निश्चल” निश्चिन्त सुरक्षित ।

उस ममता के आँचल में चैन बड़ी थी।

 

उस माता के आँचल में ….

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