#Kavita by Vivek Dubey Nishchal

चेहरे

 

चेहरे ही बयां करते है,

इंसान के हुनर को ।

नजरें ही पढ़ा करतीं हैं ,

हर एक नज़र को ।

क्यों इल्ज़ाम फिर लगाएँ ,

इस मासूम से ज़िगर को ।

दिल झेलता है फिर भी,

दर्द के हर कहर को ।

चेहरे ही बयां करते हैं ,

इंसान के हुनर को ।

शब्दों ही ,ने उलझाया ,

शब्दों के असर को ।

मिलें सब जिस नज़र में ,

कहाँ ढूंढे उस नज़र को ।

मासूमियत ने देखो ,

किया ख़त्म , हर असर को।

चेहरे ही बयां करते हैं ,

इंसान के हुनर को ।

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