#Kavita by Vivek Dubey Nishchal

एकाकी इस जीवन मे

 

नींद नही आती अब ,

पलकों पे रात बिताने को ।

रोतीं रातें क्यों अब ,

शबनम के अहसासों को ।

 

भूल गई क्यों अब,

अलसाए इन भुनसारों को ।

खोज रहा अंबर अब ,

तिमिर सँग चलते तारों को ।

 

नींद नही आती अब,

पलकों पे रात बिताने को ।

 

भूल रहे क्यों अब,

अपने ही अपने वादों को ।

रुके कदम क्यों अब,

पाते ही मुश्किल राहों को ।

 

एक अकेला चल न पाएगा ,

बीच राह में थक जाएगा ।

कैसे अपनी मंजिल पाएगा ।

आ जा तू साथ बिताने को ।

 

नींद नही आती अब ,

पलकों पे रात बिताने को ।

 

छोड़ राह मुड़, तू जाना ।

आधी राह चले , तू आना ।

कुछ दूर चले भले कोई ,

जा फिर , वापस आने को ।

 

राहों से बे-ख़बर नही मैं ,

एकाकी इस जीवन में ,

साथ चले बस मेरे कोई ।

मंजिल तो एक बहाने को ।

 

नींद नही आती अब,

पलकों पे रात बिताने को

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