# Kavita by Vivek Dubey Nishchal

समय चला है समय से आगे ।

सांझ निशा को भोर से मांगे ।

गहन निशा अंधियारे गढ़कर,

उजियारे उजियारो से मांगे ।

 

समय चला है समय से आगे ।

 

बीत रहा है समय समय से ,

सीमा समय समय से मांगे ।

दीप्त फूट चली दिनकर से ,

उजियारे दिनकर से मांगे ।

 

समय चला है समय से आगे ।

 

रुककर भी रुका नही ज़ीवन ,

प्रेरणा ज़ीवन ज़ीवन से मांगे ।

अंत नही है यह एक ज़ीवन ,

ज़ीवन भी है ज़ीवन से आगे ।

 

समय चला है समय से आगे ।

 

…. विवेक दुबे”निश्चल”

 

 

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