#Kavita by Vivek Dubey Nishchal

कामना कामनी बरदायनी ।

ज्ञानदा धनदा सिद्धिदायनी ।

कण कण रूप तुम्हारा है ।

तम हरता प्रकाश तुम्हारा है ।

 

माँ तो नाम निराला है ।

माँ ही जग उजियारा है ।

माँ ही भक्ति माँ है शक्ति,

माँ ही ने जन्म सँवारा है।

 

भक्ति भाव से करूँ अर्चना ।

माँ यह मेरी सुनो प्रार्थना ।

भाव से जो तुम्हे पुकारे ,

पूर्ण करो  मनोकामना।

 

क्या माँगूं मैं माँ तुमसे ,

बिन माँगे मिल जाता है।

शीश झुका तेरे चरणन में,

“निश्चल” निर्भय हो जाता है ।

.. विवेक दुबे”निश्चल”

 

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