#Kavita by Vivek Prajapati

नित्य हो रहे कुकर्म,  भूल  गए   लाज  शर्म

जहाँ  भी  दिखे  अधर्म,  सबक   सिखाइए।

 

हावी हो रही अनीति, जाति पाँति की कुरीति

सुदृढ़    बनाके   नीति,   इनको     मिटाइए।

 

निर्धन या धनवान ,  उद्यमी हो  या  किसान

सबके   लिए    समान,  योजना     बनाइये।

 

राह  देखते  हैं  हम,  पैदा   कीजिए  न  भ्रम

खाके  राम  की   कसम,  रामराज    लाइए।

 

विवेक प्रजापति

काशीपुर (उत्तराखण्ड)

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