#Kavita by Vivek Prajapati

सैनिकों की शहादत से व्यथित होकर लिखी रचना….यदि सहमत हों तो भरपूर शेयर करें….

 

एक बार फिर लाल हुई है पुण्य धरा यह भारत की

एक बार फिर बातें होंगी रक्षा नीति महारत की।

 

एक बार फिर व्यक्त किया है दिल्ली ने भी दुःख अपना

एक बार फिर निन्दा कर दी दिखा दिया है रुख अपना।

 

एक बार फिर हुई शहादत फिर ये भारत रोया है

एक बार फिर भारत माता ने बेटों को खोया है।

 

एक बार फिर पाकिस्तानी दहशतगर्दी कायम है

एक बार फिर आज शहीदों के हर घर में मातम है।

 

एक बार फिर आतंकी ने शासन को ललकारा है

एक बार फिर सरकारों ने चश्मा नहीं उतारा है।

 

एक बार फिर देख रहा हूँ दिल्ली में लाचारों को

एक बार फिर हँसते देखा है मैंने गद्दारों को।

 

शर्म आ रही है मुझको अब चुनी हुई सरकारों पर

शर्म आ रही है मुझको इन पत्थर की दीवारों पर।

 

शर्म आ रही है मुझको इन मरे हुए इंसानों पर

टिके हुए हैं अब भी ये तो कुछ बकवास बयानों पर।

 

जब जब भारत में कुछ अच्छा होने की उम्मीद जगी

तब तब सारी उम्मीदें ही मुझको नाउम्मीद लगी।

 

एक तरफ कश्मीर जहाँ पर सैनिक पिटते लातों से

शक्ति युक्त है सेना फिर भी घायल क्यों आघातों से।

 

एक तरफ दुश्मन ने फिर आतंक मचा कर रक्खा है

फिर भी इन सरकारों ने क्यों क्रोध बचा कर रक्खा है।

 

कैसा डर है किसका डर है साथ देश की जनता है

इतनी मौतें देखी अब तो दमन चक्र ही बनता है।

 

अब भी यदि चुपचाप रहे तो कैसे मुँह दिखलाओगे

अबकी बार चुनावों में तुम भी फिर मुँह की खाओगे।

 

राष्ट्र विरोधी ताकत जड़ से उखड़े ऐसा  काम करो

डरना कैसा जो भी करना है वह खुल्लेआम करो।

 

विवेक प्रजापति

काशीपुर (उत्तराखण्ड)

9720081882

 

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