#Kavita by Vivek Prajapati

चैन की नींद बुराई ही सो  रही  होगी

झूठ हँसता रहा सच्चाई रो रही होगी।

 

अब सुनो ये है सियासत की बिगड़ती सूरत

बीज बर्बादियों के फिर वो बो रही होगी।

 

ये यहाँ वहशी दरिन्दे कहाँ से आये हैं

फिर कोई दामिनी अस्मत को खो रही होगी।

 

उसके बेटे जवान हो गए हैं अब शायद

इसलिए बोझ बुढ़ापे का ढो रही होगी।

 

विवेक प्रजापति

 

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