#Kavita by Vivek Prajapati ,Kashipur

कश्मीर में कुछ सैनिकों के साथ कुछ देशद्रोहियों द्वारा निंदनीय व्यवहार करने पर विरोध प्रकट करती मेरी ये कविता-

 

आज कलम कैसे पकड़ूँ जब आँखों में अंगार भरे

आज लिखूँ कैसे जब मेरा शब्द शब्द हुंकार भरे।

 

आज धधकती ज्वाल हृदय में जीना व्यर्थ हुआ जाता

केसर की घाटी में क्योंकर नित्य अनर्थ हुआ जाता।

 

आज वहाँ अपनी सेना के कुछ जवान पर वार हुआ

ऐसा लगता है जैसे अब संविधान पर वार हुआ।

 

आज कहाँ हैं पैलेट गन पर नित्य लेख लिखने वाले

आज कहाँ जो कुछ मौतों पर कभी कभी दिखने वाले।

 

आज कहाँ जो गाँधी जी की चादर ओढ़े बैठे हैं

आज कहाँ जो मानवता का तेवर ओढ़े बैठे हैं।

 

अस्ल खून हैं भारत का तो वही जोश फिर दिखलायें

नहीं दिखा सकते हैं तो फिर कहीं डूब कर मर जाएँ।

 

कुछ कश्मीरी वीर सैनिकों पर लातों से वार करें

कुछ कश्मीरी माता के दामन पर सतत प्रहार करें।

 

कुछ कश्मीरी जिन्ना का अरमान मानकर बैठे हैं

भारत को वे शायद पाकिस्तान मानकर बैठे हैं।

 

कैसी होती है सैनिक की इनको लात दिखा ही दो

बहुत हो चुका अब इनको इनकी औकात दिखा ही दो।

 

बहुत हो चुका अब तो बस इन चूहों को आजाद करो

इन सबके नश्वर तन से अब रूहों को आजाद करो।

 

विवेक प्रजापति

वैशाली कॉलोनी काशीपुर

9720081882

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