#Kavita by Vivek Prajapati ,Kashipur

लगा माँ भारती के भाल पर उस दाग वाला दिन

रुलाने आ गया फिर आज जलियाँ बाग वाला दिन।

 

ग़ुलामी की तड़प से लोग दो दो हाथ करने को

इकट्ठे हो रहे थे देशहित की बात करने को।

निभाने चल पड़े थे जो किया बेख़ौफ़ वादा था

नहीं लेकिन किसी की जान लेने का इरादा था।

वहाँ पर औरतें थी और थे बच्चे व बूढ़े भी

वहाँ परिवार भी थे साथ पर कुछ थे अकेले भी।

सभी यह चाहते थे बस यही अरमान हो अपना

बहुत अब हो चुका, आजाद हिंदुस्तान हो अपना।

वहाँ पर भीड़ को परतन्त्रता मिटती दिखी होगी

वहाँ सरकार को बस चूल ही हिलती दिखी होगी।

तभी तो हाथ में बंदूक लेकर आ गए थे सब

वहाँ पर बाग़ में हर और वे ही छा गए थे सब।

सँभल पाया नहीं कोई सभी ने गोलियाँ खायी

निकल पाया नहीं कोई सभी ने गोलियाँ खायी।

जरा सी देर में ही दृश्य ऐसा घट गया था तब

शवों से बाग का मैदान लथपथ पट गया था तब।

सदा ही जो जली सीने सभी के आग वाला दिन

रुलाने आ गया फिर आज जलियाँ बाग वाला दिन।

 

जिन्हें कहते रहे हम वक़्त की आंधी कहाँ थे तब

पुजारी थे वतन के जो भला गाँधीकहाँ थे तब।

सदा कहते रहे आदर्श से जीवन जिया जाए

नहीं तब क्यों कहा इस देश से अब कुछ किया जाये।

जहाँ इस देश में निर्दोष जब हर और मरते थे

वहाँ तब देश के नायक कहाँ पर घास चरते थे।

विकल हो सोचता हूँ क्रोध का ही घूँट भरता हूँ

मग़र मैं देश के उस वीर को सैल्यूट करता हूँ।

उधम सिंह नाम है उसका उसी का गान करता हूँ

फुलाकर वक्ष को उस वीर पर अभिमान करता हूँ।

उसी ने ठान रक्खा था मनन कर बोध ले बैठा

समन्दर पार जलियाँ बाग का प्रतिशोध ले बैठा।

उसी के वक्ष में चलता रहा जो राग वाला दिन

रुलाने आ गया फिर आज जलियाँ बाग वाला दिन।

 

विवेक प्रजापति

वैशाली कॉलोनी काशीपुर

9720081882

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