#Kavita by Vivek Prajapati,Kashipur

शहीदों के पार्थिव शरीर के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार से क्षुब्ध होकर लिखी एक कविता-

 

पूछता हूँ आज एक मानव सशक्त से

पूछता हूँ आज मैं तो एक देशभक्त से।

 

पूछता हूँ आज मात भारती की शान से

पूछता हूँ आज जन जन के प्रधान से।

 

आपने कहा था देश को नया बनाएंगे

आपने कहा था वक्ष गर्व से फुलायेंगे।

 

आपने कहा था शत्रु डर से मरेंगे जी

आपने कहा था अब वार ना सहेंगे जी।

 

फिर क्यों यहाँ ये आज शोकगीत हो रहे?

अब तो जवान रोज ही शहीद हो रहे।

 

ये बयानबाजियाँ बहुत हो रही हैं क्यों?

राजनीति मजबूरियों को ढो रही हैं क्यों?

 

देशवासी पूछते हैं कुछ तो जवाब दो

बदले में क्या करोगे इसका हिसाब दो?

 

और कितना सहेंगे आप ही बताईये?

दिन कितने लगेंगे आप ही बताईये?

 

शेर अब गीदड़ों से डरने लगेंगे क्या?

अपने ही घर में भी मरने लगेंगे क्या?

 

और कितनी करेंगे विनती बताईये?

और कितने मरेंगे गिनती बताईये?

 

बात बात में ही देखो तीन साल हो गए

पूछने को आज तो कई सवाल हो गए।

 

खून से है लाल काश्मीर का सवाल है

पत्थरों की बारिशों की पीर का सवाल है।

 

आज सैनिकों के स्वाभिमान का सवाल है

देश की ही आन बान शान का सवाल है।

 

पीठ पे हुई जो उस घात का सवाल है

देश के जवान पे ही लात का सवाल है

 

सुकमाशहीद छब्बीसका सवाल है

सैनिकों के कट रहे शीश का सवाल है।

 

चुप क्यों खड़े हो बोलिये जवाब दीजिये

खुद को ज़रा सा तौलिये जवाब दीजिये।

 

कब तक यूँ ही पूछते रहेंगे बोलिये

आपसे नहीं तो किससे कहेंगे बोलिये।

 

शत्रुओं की अस्मिता को तार तार कीजिये

सोचते रहेंगे क्या कभी तो वार कीजिये।

 

विश्व देखता रहे प्रत्यक्ष वार कीजिये

हो चुका बहुत अब आर पार कीजिये।

 

उनके शरीर का भी पीस-पीस चाहिए

दो के बदले हमे पचास शीशचाहिए।

 

कवि विवेक प्रजापति

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