#Kavita by Yogendra Raghuvanshi

भर अँगड़ाई करवट लेती ,

स्वप्न लोक से जब आती है ।

बन मरीचिका ख्वाबों में क्यूँ ?

हर पल मन वो भरमाती है ।।

काजल बिंदी चूड़ी लाली ,

सब सोलह शृंगार किए वो ।

आँखें बन जाती हैं झरना ,

याद सनम की जब आती है ।।

 

तन मन थकता जाता प्रति पल ,

फ़िर भी मिलने की है आशा ।

बूंद बूंद सावन बरसे पर,

मन मेरा रह जाता प्यासा ।।

शिथिल नयन रस्ता तकते हैं ,

जिस पथ से चल वह आती है ।

आँखें बन जाती हैं झरना ,

याद सनम की जब आती है।।

 

क्या रक्खा तुम बिन जीवन में ,

अंतर्मन में सूनापन है ।

विवश हृदय से व्यथित बहुत हूँ ,

जल बिन मीन बना जीवन है ।।

विरह अग्नि जब मन में जलती ,

तब तन मेरा दहकाती है ।

आँखें बन जाती हैं झरना ,

याद सनम की जब आती है ।।

 

छोड़ गयी वो मुझे अकेला,

व्याकुल मन है तन बेकल है।

तन तृष्णा तो बुझ भी जाए ,

मन सागर पूरा निर्जल है।।

बहती नदिया कब तक ठहरे,

आख़िर में बह ही जाती है।

आँखें बन जाती हैं झरना ,

याद सनम की जब आती है।।

 

‘योगेन्द्र रघुवंशी’

धौलपुर

9311161113

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