#Lekh by Abnish Singh Chauhan

संस्मरण : लिखना तो बहाना है
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कई बार मैंने अपने पिताजी से आग्रह किया कि पिताजी दादाजी के बारे में कुछ बताएं? सुना है दादाजी धनी-मनी, निर्भीक, बहादुर, उदारमना व्यक्ति थे। जरूरतमन्दों की धन आदि से बड़ी मदद करते थे, घोड़ी पर चलते थे, पढे-लिखे भी थे? परन्तु, पिताजी ने कभी भी मेरे प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। जब कभी भी मैंने उनसे कुछ पूछना चाहा तब वह मौन धारण कर लिया करते; लाख आग्रह करने पर भी टस-से-मस नहीं होते। किंतु, इस बार उनका मौन, पता नहीं कैसे, टूट ही गया! बस, भेद इतना-सा था कि अबकी बार प्रश्न मेरे नहीं थे, बल्कि मेरे ज्येष्ठ पुत्र ओम के थे।

पिताजी ओम से अत्यधिक प्रेम करते हैं। जब ओम ने पिताजी से अपने परदादा के बारे में पूछना प्रारंभ किया तब उन्होंने बड़ी मुश्किल से संक्षेप में दो-चार बातें बतायीं। मैं भी उन्हें बड़े ध्यान से सुन रहा था। उन्होंने बताया कि अतीत के बारे में बात करने से कोई लाभ नहीं है, ऐसा करने से कभी-कभी मन को कष्ट भी होता है; इसलिए अतीत पर चर्चा करना मुझे ठीक नहीं लगता। फिर भी तुम्हारा आग्रह है इसलिए बताना चाहूंगा कि तुम्हारे परदादा रेलवे में नौकरी करते थे। उनकी पहली पोस्टिंग बनारस में हुई थी। वह चार भाई थे- सबसे बड़े श्रद्धेय (स्व) अर्जुन सिंह, दूसरे नंबर पर वह स्वयं और दो छोटे भाई- श्रद्धेय (स्व) श्याम सिंह और श्रद्धेय (स्व) वंदन सिंह। चारों भाई बड़े निर्भीक और बहादुर थे; उनके लगभग डेढ़-डेढ़ गज़ के सीने थे; लाठी चलाने में सभी माहिर थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रह चुके परदादा श्रद्धेय (स्व) नवाब सिंह अपने क्षेत्र के अति संपन्न व्यक्तियों में से एक थे; वह ससुराल पक्ष से भी बहुत मजबूत थे। उनके पास समय-सापेक्ष सब सुख-सुविधाएँ थीं। उन्होंने अपनी सामर्थ्यभर अपने बेटों की अच्छी परिवरिश की; किन्तु, नियति को कुछ और मंजूर था!

हुआ यह कि जब उनके बेटे जवान हुए तो उनमें से तीन बेटे ऐशो-आराम का जीवन जीने लगे। काम-धाम में उन भाइयों का मन नहीं लगता, सो उनका ज्यादातर समय ननिहाल हथिनापुर (बिधूना के पास) में ही बीतता था। ननिहाल में उनके मामा अपने पिता के इकलौते पुत्र थे। उनके पास लगभग 700 बीघा जमीन थी, 20-20 बीघा के दो-तीन बाग थे, पुश्तैनी कोठी थी, घोड़ा-गाड़ी थी, नौकर-चाकर थे। यह वह समय था जब स्वतंत्र भारत में अपना संविधान लागू हो चुका था और प्रथम लोकसभा के लिए आम चुनाव होने वाले थे। इधर श्रद्धेय नवाब सिंह ने देखा कि उनके बेटे अपनी अलग राह पर चल रहे हैं, तब उन्हें अपने दूसरे बेटे जोधा सिंह की याद आई और अंतिम विकल्प के रूप में वह उन्हें घर वापस लाने के लिए बनारस को चल पड़े; बनारस, जहां उनका लाड़ला बेटा जोधा सिंह रेलवे में कार्यरत था। बनारस पहुंचकर जैसे-तैसे उन्होंने अपने बेटे को मनाया और उनसे रेलवे की नौकरी छोड़ने का आग्रह किया। वह अपने पुत्र से बोले कि ‘बेटा, यद्यपि हमारे पास किसी बात की कमी नहीं, फिर भी ऐसा लगता है कि मैं भीतर से टूट गया हूं, अकेला पड़ गया हूं। मुझे तुम्हारी जरूरत है। अब तुम घर चलो।’ इसे नियति मान अपने पिता के आदेश का पालन करने के लिए वह रेलवे की नौकरी छोड़ अपने पिता के साथ गांव चले आए। उन्होंने गांव आकर बहुत परिश्रम किया, खेती की, कारोबार किया और खूब धन कमाया। वह जरूरतमंद लोगों को ब्याज पर या बिना ब्याज के भी धन उधार देने लगे। उनका लेन-देन का व्यापार भी चल निकला। आस-पास के तमाम गांवों के लोग उनसे कर्ज लेते और काम होने पर कई भले लोग कर्ज चुका भी देते। हाँ, कुछ ऐसे लोग भी रहते जो कर्ज नहीं भी चुका पाते थे और कुछ ऐसे भी जो कर्ज लेकर कर्ज चुकाना ही नहीं चाहते थे। कर्ज न चुकाने वालों के लिए वह सिर्फ इतना कहते कि उन्होंने उन लोगों का पिछले जन्म में कुछ खाया-पिया होगा, सो वह सब चुकता हो गया और यदि नहीं खाया-पिया होगा तो वे लोग अगले जन्म में चुकायेंगे ही।

कर्ज लेने वालों में उनके एक ऐसे मित्र भी थे, जिन्होंने सम स्थिति में भी उनका कर्ज नहीं चुकाया। वह कुसमरा गांव (बिधूना- औरैया के पास) के अति संपन्न व्यक्तियों में से एक थे; वह गांव के प्रधान थे, उनके दो भट्टे और उनकी एक आढ़त चलती थी; उनके पास कई हेक्टेयर जमीन भी थी। श्रद्धेय जोधा सिंह का उनसे परिचय उनकी ससुराल (धनवाली- बिधूना) में उनके साले साहब श्रद्धेय छोटे सिंह ने करवाया था। श्रद्धेय छोटे सिंह धनवाली गाँव के समृद्ध व्यक्ति थे; उनके पास लगभग 200 बीघे जमीन थी, कई बाग़-बगीचे थे; एक हलवाहा और एक नौकर भी उनके यहां सदैव काम पर लगे रहते थे। हुआ यह कि कुसमरा के उन मित्र का गांव के ही एक सम्पन्न परिवार से प्रथम प्रधानी के बस्ते को लेकर विवाद हो गया, जिसमें एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। हत्या का आरोप उन पर लगा और उन्हें जेल जाना पड़ा। उनकी अनुपस्थिति में आहत विपक्षियों ने उनके भट्टे और आढ़त को बंद करवा दिया, खेत परती पड़े रहे। उनकी पत्नी और बच्चे गांव छोड़कर उनकी ससुराल चले गए। घर-गृहस्थी चौपट हो गयी, आमदनी ख़त्म हो गयी और खर्चे वही- शाही। ऐसे में श्रद्धेय जोधा सिंह ने मित्र धर्म का निर्वहन करते हुए उन्हें धीरे-धीरे लगभग रु 70,000/- (सत्तर हजार) बिना ब्याज के उधार दिए। उन्होंने उनकी जमानत करवाई; जनपद में केस लड़ने से लेकर हाईकोर्ट इलाहबाद में केस जीतने तक, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, शादी-विवाह आदि में भी बहुत धन खर्च किया। पिताजी बताते है कि जब वह कक्षा 10 के छात्र थे तब उन्हें दादाजी ने उन मित्र की बेटी की शादी के लिए रु 10,000/- (दस हज़ार) देने के लिए भेजा था, जिससे उनकी बेटी का विधिवत विवाह उच्च घराने में हो सका था। यह वह समय था जब भारत चीन को 1967 में नाथु ला दर्रे में हुई भिड़ंत में शिकस्त दे चुका था।

पिताजी का जन्म 07 जुलाई 1951 को हुआ था। सात माह में ही अपनी माँ के गर्भ से जन्म लेने के कारण जन्म के समय न तो उनकी आँखें ही खुली थी और न ही होठों से कोई स्वर फूटा था। इस नवजात शिशु को रुई में लपेटकर पीढ़ी पर लिटा दिया जाता था और होठों पर रुई का फोहा दूध में भिंगोकर रख दिया जाता था। दादी माँ श्रद्धेया रामबेटी बड़ी साधिका थीं, सो उन्होंने अपने इष्ट से कह दिया कि अब उन्हें ही इस बच्चे की देख-रेख करनी है। चमत्कार हुआ कि 02 माह बाद पिताजी ने आँखें खोल दीं। पिताजी दो भाई थे; उनके बड़े भाई श्रद्धेय (स्व) निरंजन सिंह उनसे लगभग 12 वर्ष बड़े थे और उनकी इकलौती बहन श्रद्धेया (स्व) बिट्टा देवी भी उनसे लगभग 5-6 वर्ष बड़ी थीं। पिताजी जब बाल्यावस्था में ही थे कि तभी उनके दादाजी श्रद्धेय नवाब सिंह को किसी ने जहर दे दिया था, जिससे उनकी तत्क्षण मृत्यु हो गयी थी। इधर ताऊ जी श्रद्धेय निरंजन सिंह जी ने भारतीय सेना में नौकरी कर ली, उनका विवाह आदि हो गया, तो उधर दादाजी की धीरे-धीरे उम्र बढ़ने लगी। वह बीमार रहने लगे। खांसी की शिकायत। इटावा जनपद के बड़े-बड़े डॉक्टरों ने उनका इलाज किया, किंतु वह भी उनकी खांसी की बीमारी को ठीक न कर पाए। कुछ दिन आराम मिलता, फिर वह बीमार पड़ जाते। समय बीतता रहा। वह वृद्ध हो रहे थे। शरीर शिथिल। इस दौरान उन्होंने पिताजी को कुसमरा अपने मित्र के पास अपना रुपया वापस लेने के लिए कई बार भेजा, परन्तु उन्होंने एक भी रुपया वापस नहीं किया। जब पिताजी उनसे कर्ज चुकाने के लिए कहते तो वह रो देते और कहते कि उनका बड़ा बेटा अध्यापक हो गया है, वह जमीन नहीं बेचने देता, कर्ज देने से मना करता है। बाद में उनका छोटा बेटा भी MBBS करने के बाद सरकारी डॉक्टर हो गया और बिधूना में प्रैक्टिस भी करने लगा था।

कई वर्षों तक बीमार रहने के बाद दादाजी का देहांत हो गया। देहांत के समय दादाजी का लगभग रु 700,000/- (सात लाख), जोकि ब्याज और बिना ब्याज के लोगों में बंटा हुआ था, डूब गया। कहते हैं उस समय रु 1000/- (एक हज़ार) में एक एकड़ जमीन खरीदी जा सकती थी। पिताजी उस समय B.Sc (Ag) स्नातक-प्रथम वर्ष के छात्र थे; उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी; दादाजी का धन भी डूब चुका था। ताऊजी भी बँटवारा कर अपने परिवार के साथ अलग रहने लगे। घर चलाने के लिए थोड़ी-बहुत जमीन बची थी और दादी के पास थोड़ा-बहुत पैसा। कुसमरा की 60 बीघा जमीन दादाजी अपने मित्र की मदद करने के लिए पहले ही बेच चुके थे और धनवाली में जो 50 बीघा जमीन उन्होंने कभी खरीदी थी, उसमें से लगभग आधी जमीन को दादाजी की मृत्यु के बाद ताऊजी ने अपने मामाजी जी से कहकर बेच दिया; यद्यपि बेचने के समय पिताजी उनके साथ ननिहाल गए थे, परन्तु उन्हें एक भी पाई हिस्से में नहीं मिली। इन विषम परिश्थितियों में भी दादी माँ ने हार नहीं मानी। वह साहसी महिला थीं। कड़क-मिजाज। स्वाभिमानी। उच्च कोटि की साधिका। उन्होंने पिताजी की पढ़ाई पूरी करवाई, विधिवत विवाह करवाया। मेरी माँ ने उनकी खूब सेवा की। सेवा ऐसी कि उन्होंने (और पिताजी ने भी) केंद्र सरकार की नौकरी तक छोड़ दी, किन्तु अपनी सास का साथ नहीं छोड़ा (जिस समय माताजी-पिताजी का सरकारी सेवा में चयन होने के बाद सर्विस ज्वाइन करने के लिए दिल्ली आना था, दादी माँ (निर्वाण : 16 अप्रैल 1985 ) की तबियत बहुत ख़राब चल रही थी)। बाद में माताजी की नियुक्ति गृह जनपद के एक इंटर कॉलेज में भी हुई थी, परन्तु दादीमाँ की हालत ऐसी नहीं थी कि उन्हें अकेला छोड़ा जा सकता, इसलिए उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी। उनका यह त्याग कम तो नहीं!

​- अवनीश सिंह चौहान ​

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