#Lekh by Ajeet Singh Charan

-:सुहाना सफर :-

 

स्वर्णिम भारत अतुल्य भारत साइनिंग इंडिया मैं इन नारों से  कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गया और खासकर “पधारो म्हारे देश” वाले नारे से हालांकि मैं खुद भारतवासी हूं इसलिए पधारने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता फिर भी इस वाक्य में कुछ कशिश है कि मुझे शुरूर हुआ और मैं भारत दर्शन की अभिलाषा से  आकंठ भर गया सो मैंने भारत-दर्शन का निर्णय लिया चूंकि अपन बापू को फॉलो करता है और गांधीजी ने कहा है कि “भारत गांव में निवास करता “है सो मैंने गांव जाने का निर्णय लिया लेकिन समस्या यह थी कि कौन से गांव जाऊं ?क्योंकि पर्यटन पुस्तिका वाले तो सारे गांव हेरिटेज श्रेणी में आते हैं और वहां जाने का मतलब है जेब के साथ-साथ भारत दर्शन की अभिलाषा को ढीला करना अतः मैंने अपने गांव जाने का निर्णय लिया क्योंकि मुझे हेरिटेज नाम से ऐसा लगता है जैसे मैं किसी विदेशी शहर में हूं और हेरिटेज की जहां तक बात है हमारा कोई मुकाबला नहीं एक अच्छे खासे मकान पर घास फूस डालकर हेरिटेज बना देते हैं, अच्छे खासे फर्श पर गेरूं रंग कर सफेद आड़ी-तिरछी लाइनें खींचकर” मांडने “बनाते हैं लो  तैयार है रेडिमेंट’ राजस्थान संस्कृति’ सो मैं इन से बोर हो करके विशुद्ध रूप से ग्रामीण भारत माता की खोज में निकल पड़ा

सुना है महात्मा गांधी को गांवों से बड़ा प्यार था इसलिए भारत आजाद होते ही भारत माता गांव में चली गई (यह बात अलग है कि दिल्ली की गलियों में उसे किसी ने पूछा तक नहीं) लेकिन  पाकिस्तान माता  किधर गई मुझे पता नहीं! अपने को क्या अपने को तो भारत माता के दर्शन करने थे सो  निकल पड़े घर से “इधर चला मैं उधर चला “की तर्ज पर काफी मशक्कत के बाद मुझे गांव की एक बस मिली बस कहना शायद उसे बहुत ज्यादा गौरव देना होगा जहां तक मेरी जानकारी है उसका अगला हिस्सा किसी ट्रक का  था और पीछे की बॉडी असेम्बल की हुई सीटे  सीधी सपाट थी  खैर अपने को क्या वाले चीर परिचित भारतीय अंदाज मे   मैं बस में चढ़ने लगा तभी एक मिस्टर डेजर्ट से दिखने वाले व्यक्ति ने मुझे ललकारा “जनाना है क्या?” पहले तो मुझे समझ में नहीं आया कि यह क्या कह रहा है जनाना है या जानना है फिर तीन-चार लोगों से मेरी सलाह मशवरा करने पर पता चला इसके कहने का मतलब था कि अंदर सिर्फ महिलाएं भेड़ बकरी बच्चे और सामान रखा जाता है पुरुषों को उपर बैठना पड़ता है “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता ,नारी तू नारायणी “जैसे उनकी भावनाएं देखकर मन गदगद हो गया मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया तभी मैंने  झुके हुए सिर से ही देखा  कि बस का एक टायर पंचर है और वह 2 घंटे देर से जाएगी मैंने पूछा कोई वैकल्पिक साधन जवाब आया 11 नंबर मैंने सोचा कोई सिटी बस की तर्ज पर ग्रामीण बस होगी फिर पता चला कि उनका इशारा पैदल की तरफ था आज मुझे पता चला कि लोकोक्तियों का जन्म गांव में क्यों होता है यह तो ज्ञान का पहला स्टेप था  भारत माता तक पहुंचते-पहुंचते मैं पूर्ण ज्ञानी हो जाऊंगा खैर बस स्टार्ट हुई सबकी आंखे चमकी और सब बस के ऊपर चढ़ गए मैं भी सीढी दर सीढी चढ़ते गया और देखा कि मैं छत के ऊपर हूं यह अनुभव रोमांचित कर देने वाला था कान फाड़ देने वाला बस का शोर सायं सांय करती हवाएं गिरने से बचने के लिए थामी हुई  एक दूसरे की कालरे सहकारिता वाले अंदाज में “एक शब्द के लिए सब एक के लिए” इसी बीच एक युवा संगीत प्रेमी के मोबाइल में गाना बजा ‘ यूं ही चला चल राही यूं ही चला चल ‘लेकिन बस ने  उस पर ध्यान नहीं दिया और वह  रुक गई  मैं खुश हुआ कि चलो यात्रा खत्म लेकिन मैं गलत था क्योंकि न ही तो यह पड़ाव था ,ना ही यह गांव था यह था एक रेतीला  टीला जिसमें बस फस गई थी और बिना किसी   अनुरोध के हम आसपास का घास फूस उखाड लाए और बस के आगे बिछाया फिर सामूहिक धक्का प्रतियोगिता आयोजित करके बस को निकलवाया बजरंग बली की जय के साथ ही बस फिर चल पड़ी मै  उदास हो गया मुझे बापू याद आने लगे  मुझे लगा कि शायद उन्होंने मुझे भारत माता का गलत एड्रेस दे दिया है तभी बस रूकी और लोग उतरने लगे उन्हें देखकर मैं प्रेरित हुआ और मैं भी उतर गया लो आ गया मेरा गांव

अब मैं गांव के शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में था मैने हाथ मुंह धोने के लिए जैसे ही नल चलाया उसमे पानी नहीं था अब मै दूसरी जगह बने नल पर गया जैसे मैने नल चलाया पीछे से आवाज आई भाईजी ओ मेघवालां को है  कोई मुझे धर्मभ्रष्ट होने से  बचाना चाहता था  पर मैं प्यासा था और मैंने  भ्रष्ट होना उचित समझा सो पानी पी लिया और आगे बढ़ गया और वहां पहुंचा जहां मनरेगा  चल रहा था मैने सोचा भारत माता यहीं  होगी  पर वे लोग ताश के पत्ते खेल रहे थे और औरतें पोमचा बांध रही थी पास ही मे एक ट्रेक्टर मिट्टी सीधी कर रहा था मुझे उनकी बुद्धि पर गर्व हुआ जो काम टेक्टर 200 रूपये मे कर रहा था  कर रहा है उसके लिए मजदूरों को  2000 रूपये दिये जाते है  लेकिन मेरे हाथ मे डायरी देख वो चौंक पडे उन्हे लगा मै निरीक्षण पर आया हूं जब मैने कहा मै लेखक हूं तो वे हंस पडे उन्होने पूछा “थे म्हारो फोटू छाप स्यो कै?”मैने चारो तरफ देखा   मुझे भारत माता नजर नहीं आई मैंने सोचा शायद खेतों में होगी मैं वहां पर गया वहां भी मुझे भारत माता नजर नहीं आई फिर मैंने पूछा यहां पर भारत माता नहीं है क्या ?लोग हंसने लगे और उन्होंने बताया कि भारत माता तो जब तब कोई मंत्री वोट मांगने आता है तभी एक आध  बार वोट देने गांव में आती अन्यथा यहां नहीं मिलती मुझे भारत माता के दर्शन तो नहीं हुए लेकिन उनके गांव छोड़कर जाने के कारण पता है आज गांव के लोग सादगी सरलता भाईचारा और प्रेम में उतने नहीं रंगे  हैं जितनी छिछोली राजनीति में रंगे है।

©अजीत सिंह चारण

रतनगढ (चूरू) 9462682915

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