#Lekh By Anand Singhanpuri

सत्य अहिंसा के राहगीर तथा देश के प्रति समर्पण और प्रेम के सशक्त हस्ताक्षर- पं माखनलाल चतुर्वेदी जी
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ऐसे बिरले होते है जो देश को अपना जीवन समर्पण कर देते हैं। जब उस समय गुलामी की जंजीरों में जकड़े हर भारतीय थे ।उनमें देश के प्रति क्रांति,देश भक्ति का बीज रोपण करना।यह कोई साधारण कार्य नहीं था जिस प्रकार कोई शिल्पकार हथोड़े से छीनकर बेजान पत्थर को मूर्तरूप दे अद्भुत मिशाल देता हैं। परन्तु हम यह भूल जाते है की कितने आघातों से निष्प्राण पत्थर में प्राण फूंकना पड़ा।तब जाकर कही आजादी मिली।वैसी ही देश के प्रति अपना सर्वस्व जीवन समर्पित कर देने वाले कवि,क्रांतिकारी, अध्यापक, लेखक,पत्रकार पंडित माखन लाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1888 में भारत के मध्य प्रदेश शहर के होशंगाबाद जिले के बाबई गांव में हुआ था| उनके पिता जी का नाम नन्द लाल चतुर्वेदी था| उनके पिता जी गांव के प्राइमरी स्कूल के हिंदी के अध्यापक थे| माखन लाल चतुर्वेदी को हिंदी, संस्कृत, बंगला ,अंग्रेजी ,गुजरती आदि सभी भाषा का ज्ञान था| उनकी क्रांतिकारी कविताओं ने भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के मन में देशभक्ति के रंग उजागर किये थे| इसी कारण उन्हें कई बार अंग्रेज़ो का सामना करना पड़ा और अनेकों बार जेल भी गये| परन्तु उनमें साहस,वीरता तनिक भी कम नही हुआ।

उपलब्धियां – अध्यापन कार्य प्रारंभ(1906) ,शिक्षण पद का त्याग, तिलक का अनुसरण (1910), शक्तिपूजा लेख पर राजद्रोह का आरोप (1912), प्रभा मासिक का संपादन (1913), कर्मवीर से सम्बद्ध (1920)
प्रताप का सम्पादन कार्य प्रारंभ (1923), पत्रकार परिषद के अध्यक्ष(1929), म.प्र.हिंदी साहित्य सम्मेलन (रायपुर अधिवेशन) के सभापति ,भारत छोड़ो आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता (1942) सागर वि.वि. से डी.लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित (1959)
प्रमुख कृतियां – माता, कला का अनुवाद, युग चरण, समर्पण, वेणु लो गूंजे धरा, अमीर इरादे गरीब इरादे, समय के पांव, मरण ज्वार ,चिंतक की लाचारी ,हिमकिरीटनी, साहित्य देवता तथा हिमतरंगिनी आदि।
पुरस्कार- हिमकिरीटनी पर देव पुरस्कार (1943), हिमतरंगिनी पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (1963), पद्मभूषण (1963) माता पर साहित्यकार संसद प्रयाग द्वारा साहू जगदीश प्रसाद पुरस्कार, म.प्र. शासन द्वारा 7500 रूपए के साथ सम्मान अभिनंदन ग्रंथ समर्पित (1966)
पुष्प की अभिलाषा से नव जागरण व स्पूर्ति का गान-
उक्त कविता छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जेल में सन 1921 को लिखी गई थी।जब उनको राष्ट्रद्रोह के कारण अंग्रेजों ने जेल कर दिया था।
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का नाम छायावाद की उन हस्तियों में से है जिनके कारण वह युग विशेष हो गया। उस युग के कवि कुदरत को स्वयं के करीब महसूस कर लिखा करते थे। चतुर्वेदी जी की भी कई रचनाएं ऐसी हैं जहां उन्होंने प्रकृति के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है। उनकी रचना पुष्प की अभिलाषा और फूल की मनुहार में उन्होंने एक कुसुम के द्वारा अपनी आंतरित संवेदनाओं को प्रकट किया है जिससे संकेत मिलता है कि वह एक राष्ट्रप्रेमी व्यक्ति होने के साथ-साथ अपनत्व से आप्लावित व्यक्ति थे। वैसे तो माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कई ऐसी रचना किये जो आज के समय में भी बहुत प्रसिद्ध हैं और जिन्हे आज के साहित्यकार भी अपनी कविताओं में प्रयोग करते हैं लेकिन एक ऐसी कविता हैं जिसे पुरे भारत वर्ष के लोगो ने सराहा|
वह हैं पुष्प की अभिलाषा उक्त कविता उनकी अबतक की सबसे प्रसिद्ध रचना हैं| इस कविता की रचना से अंग्रेजी शासन को लोहा दिखाना था|देशभक्ति के ज्वार तारुण हृदयतल में उद्वेलित करना था।निस्संदेह स्वंतत्रता प्राप्ति के लिये लोगों के मन में जोश पैदा कर दिया-
कविता का कुछ अंश उद्धृत हैं-

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावे वीर अनेक!

बदरिया थम-थमकर झर री !

बदरिया थम-थनकर झर री !
सागर पर मत भरे अभागन
गागर को भर री !

बदरिया थम-थमकर झर री !
एक-एक, दो-दो बूँदों में
बंधा सिन्धु का मेला,
सहस-सहस बन विहंस उठा है
यह बूँदों का रेला।
तू खोने से नहीं बावरी,
पाने से डर री !

बदरिया थम-थमकर झर री!
जग आये घनश्याम देख तो,
देख गगन पर आगी,
तूने बूंद, नींद खितिहर ने
साथ-साथ ही त्यागी।
रही कजलियों की कोमलता
झंझा को बर री !
बदरिया थम-थमकर झर री !
जीवन, यह मौलिक महमानी

जीवन, यह मौलिक महमानी!

खट्टा, मीठा, कटुक, केसला
कितने रस, कैसी गुण-खानी
हर अनुभूति अतृप्ति-दान में
बन जाती है आँधी-पानी

कितना दे देते हो दानी
जीवन की बैठक में, कितने
भरे इरादे दायें-बायें
तानें रुकती नहीं भले ही
मिन्नत करें कि सौहे खायें!

रागों पर चढ़ता है पानी।।
जीवन, यह मौलिक महमानी।।

ऊब उठें श्रम करते-करते
ऐसे प्रज्ञाहीन मिलेंगे
साँसों के लेते ऊबेंगे
ऐसे साहस-क्षीण मिलेगे

कैसी है यह पतित कहानी?
जीवन, यह मौलिक महमानी।।

ऐसे भी हैं, श्रम के राही
जिन पर जग-छवि मँडराती है
ऊबें यहाँ मिटा करती हैं
बलियाँ हैं, आती-जाती हैं।

अगम अछूती श्रम की रानी!
जीवन, यह मौलिक महमानी।।

पुष्प की अभिलाषा से हृदय परिवर्तन
इस कविता द्वारा चतुर्वेदी जी ने फूलों को लेकर यह बताने की कोशिश की हैं कि जब कभी माली अपने बगीचे से फूल तोड़ने जाता है तो जब माली फूल से पूछता है कि तुम कहाँ जाना चाहते हो? माला बनना चाहते हो या भगवान के चरणों में चढ़ाया जाना चाहते हो तो इस पर फूल कहता है –

मेरी इच्छा ये नहीं कि मैं किसी सूंदर स्त्री के बालों का गजरा बनूँ
मुझे चाह नहीं कि मैं दो प्रेमियों के लिए माला बनूँ
मुझे ये भी चाह नहीं कि किसी राजा के शव पे मुझे चढ़ाया जाये
मुझे चाह नहीं कि मुझे भगवान पर चढ़ाया जाये और मैं अपने आपको भागयशाली मानूं
हे वनमाली तुम मुझे तोड़कर उस राह में फेंक देना ।
जहाँ शूरवीर मातृभूमि की रक्षा के लिए
अपना शीश चढाने जा रहे हों।
मैं उन शूरवीरों के पैरों तले आकर
खुद पर गर्व महसूस करूँगा।

मृत्यु
साहित्य जगत के इस अमर सपूत,राष्ट्र के अनमोल धरोहर का 30 जनवरी 1968 को देहावसान हो गया। तब पंडितजी उस समय 79 वर्ष के थे,और देश को तब भी उनके लेखन से बहुत उम्मीदें थी।

जन्मदिवस विशेषांक
लेख-
कवि आनन्द सिंघनपुरी, युवा साहित्यकार
रायगढ़।9993888747

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