#Lekh by Arun Kumar Arya

अपेक्षा

 

हम सब सम्मान को प्रतिष्ठा का विषय बना लेते हैं । विषय चाहने वाला ही तो विषयी कहलाता है।सम्मान का अतिशय अभिलाषी महत्वाकांक्षी होता है।कहा गया है कि महत्वाकांक्षी निष्ठुर होता है।विषयी होना दुख का कारण होता है।इससे निवृत्ति पाने के लिए निष्काम कर्म कीजिए।निष्काम कर्म सुख- दुख, लाभ- हानि ,मान- अपमान से परे है।अगर आप सामाजिक कार्यकर्ता हैं,किसी ग्रुप के कवि साहित्यकार हैं तो आलोचनाएं स्वाभाविक है,आलोचनाओं से घबराकर पलायन मत कीजिए अपितु आलोचनाओं को कसौटी मानकर उस पर खरा उतरने का प्रयास कीजिए।आलोचनाएं वरदान होती हैं और अनावश्यक सम्मान की चाह पतन का कारण। समाज सुधारक संतो की कहानी पढ़िए कि उन्हें जीवन में कितना संघर्ष करना पड़ा है, कितनी आलोचनाएं सहनी पड़ी हैं ,वे ऐसे ही पूज्य नहीं बने हैं।हम दूसरों से अपेक्षा रखते हैं लेकिन मुझसे भी तो कोई अपेक्षा रखता है ।हम दूसरों की अपेक्षाओं पर कितने खरे उतरे हैं पहले इसका आकलन कर, दूसरे से अपेक्षा को देखेंगें तो हमें कहीं कष्ट ही नहीं होगा।

अपेक्षा ही क्यों रखते हैं ? अपेक्षा पूरी न होने पर कष्ट होता है।अपेक्षा अक्षम रखते हैं।आप अपने को सदैव सक्षम समझिए।अपनी अपेक्षाओं को आवश्यकतानुसार ही रखिए और उसे पूरा करने में अपने को समर्थ समझिए, ईश्वर ने आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए यह सुन्दर सुडौल शरीर एवं स्वस्थ मस्तिष्क किस दिन के लिए दिया है,उससे अपनी हर आवश्यकताओं को पूरी कीजिए कहीं कोई कष्ट नहीं होगा।

 

अरुण कुमार आर्य

प्रधान आर्य समाज मन्दिर  -मुग़ल सराय चन्दौली।

 

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