#Lekh by Arun Kumar Arya

लक्ष्य

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लक्ष्य विहीन न तो कार्य ही ठीक है और न ही मानव जीवन।कार्य तो बहुत से हैं लेकिन जीवन एक ही है, पता नहीं फिर यह कभी मिलेगा कि नहीं।इस जन्म के पूर्व हम क्या थे ,मरने के पश्चात् किस योनि में कहाँ जाएंगे ? यह प्रश्न न तो कोई हल कर सका है और न कोई हल कर सकेगा। शायद कोई योगी साधक अपने पूर्व जन्मों के विषय में जाना हो।हाँ इतना तो व्यक्ति अवश्य जानता है कि जैसा हम कर्म करेंगें वैसा हमें फल भोगने को मिलेगा। जो हमारे शुभ कर्म हैं या यह कह सकते हैं कि कुछ ऐसे कर्म भी होते हैं जो समय के सीने पर एक गहरी लकीर खींचकर लोगों को अमर बना देते हैं।ऐसा वही करते हैं जिनके सामने लोक कल्याणकारी लक्ष्य होते हैं,जिसको वे अनेकों बाधाओं के पश्चात् भी पूरा करके ही दम लेते हैं।लक्ष्य पूरा करने के लिए जब तक मन में भाव नहीं उत्पन्न होंगें,अदम्य उत्साह के साथ उसके लिए आगे नहीं बढ़ेंगे, आने वाली बाधाओं से घबड़ाएंगे नहीं तब तक लक्ष्य पूरा करना कोरी कल्पना है।

लक्ष्य के मार्ग में वे ही बाधा बनते हैं जिससे उनका स्वार्थ टकराता है या उस लक्ष्य के आगे उनके किए गए कार्य उन्हें बौना सिद्ध करते हैं या उनकी मान्यता के विरुद्ध कोई कार्य हो रहा हो।बाधा उत्पन्न करने वाला व्यक्ति किस हद तक नुकसान करेगा, कहा नहीं जा सकता है। कुछ को तो लक्ष्य पूरा करने में प्राण तक भी गँवानी पड़ी। ऐसे में एक उदाहरण महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती भी हैं जिन्हें वेदों का प्रचार प्रसार करने और वैदिक मान्यताओं को सिद्ध करने तथा उसके विरुद्ध हो रहे कार्यों के प्रति आवाज़ उठाने में अनेकों बार ज़हर पीने पड़े और अन्त में काँच युक्त दूध में ज़हर पीने के कारण इस दुनिया से जाना पड़ा।

वह व्यक्ति भले ही इस दुनिया से चला गया परन्तु वेदों वाला ऋषि बनकर गया।इतिहास इस बात का साक्षी है कि उसने अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए अथक प्रयास किया, अनेक लोगों से सम्पर्क किया, स्थान स्थान पर उसे शास्त्रार्थ करना पड़ा, बहुत जिल्लत झेलनी पड़ी।जैसे अर्जुन पेड़, शखाओं और पत्तों को न देखकर केवल चिड़िया की आँख देखा उसी तरह दयानंद विभिन्न धर्म ग्रंथ रहते हुए भी मुख्य रूप से केवल वेदों को देखा क्योंकि उसी वेद से उसे सब कुछ मिला , उसी को आधार मानकर उन्होंने राष्ट्र में स्वराज्य का डंका पीटा,इसके लिए उन्होंने   सत्यार्थ प्रकाश में भी राजा के कर्तव्य को दर्शाया और विदेशी शासकों का घोर विरोध किया ,युवकों में राष्ट्रप्रेम का अलख जगाया,यही कारण था कि आर्य समाज आज़ादी के दीवानों का केन्द्र रहा है, जातिवाद का भी उन्होंने घोर विरोध किया, विभिन्न पूजा पद्धति को नकारते हुए निराकार परब्रह्म की उपासना करने को कहा, सबको वेद पढ़ने-पढ़ाने और सुनने सुनाने का अधिकार है,इसे उन्होंने  स्वयं वेदों से सिद्ध किया। अंधविश्वासों और कुरीतियों का जमकर विरोध किया,इसके लिए उन्हें काफ़ी संघर्षों का सामना करना पड़ा। उनके मृत्यु के पश्चात् कुछ लोगों ने उनके मिशन को आगे बढ़ाने का अथक प्रयास किया, ऐसा करने पर श्रद्धानंद,लेखराम, लाला लाजपत राय सरीखे व्यक्तियों को भी जान तक गँवानी पड़ी और वे इतिहास के विषय बन गये।आप जब एक लक्ष्य लेकर चलेंगें स्वत: उसके साथ बहुत से लक्ष्य जुट जाएंगे जैसा कि स्वामी दयानंद वेदों की ओर लौटो लेकर चले उसी के साथ बहुत से लक्ष्य बन गए।अर्जुन ने मछली के आँख में क्या तीर मारा, उसके साथ उन्हें द्रोपदी मिली ,पांचाल नरेश से सम्बन्ध बने, कौरवों के विरुद्ध लड़ने के लिए एक प्रबल शक्तिशाली राज्य मिला, पांचाल नरेश के मित्र राजा भी मिले।एक लक्ष्य बनाकर चलिए, “एक साधे सब सधे सब साधे सब जाय” की कहावत को चरितार्थ कीजिए ।कुछ एक ऐसे भी हुए जो कि स्वामी जी के मन्तव्यों को आगे बढ़ाने का वीणा उठाए उन्हें सम्मान भी मिला , वे एक लक्ष्य से भटककर और भी लक्ष्य बना लिए, सम्मान के अहंकार में वे अपने लक्ष्य से भटककर  एक अपना नया मत तक चलाकर अपने को स्वयं लोगों का मसीहा  बन बैठे।इनका  जब भी इतिहास लिखा जाएगा उसके साथ आर्य समाज या ऋषि दयानंद का नाम अवश्य जुड़ेगा, व्यक्ति जब इन पर गहन चिन्तन करेगा तो पायेगा कि स्वार्थ में ऐसे लोग भटककर ग़लत दिशा पकड़ लिए। आश्चर्य की बात है कि जिस व्यक्ति पूजा का स्वामी जी ने विरोध किया उसी व्यक्तिपूजा के वे समर्थक बन गये, अपने को भगवान सिद्ध कर बैठे।वर्तमान में भी कुछ ऐसे लोग हैं जो आर्य समाज में आए उसका प्रचार ,प्रसार करने में जुटे, उन्हें अतिशय सम्मान मिला, सम्मान और सम्पत्ति की भूख ने उन्हें ऐसा बना दिया कि वे लक्ष्य से भटक गये और स्वामी जी के मन्तव्यों में ही परिवर्तन का मन बना लिए, यहाँ तक कि उनकी अमर पुस्तक “सत्यार्थ प्रकाश ” में ही काट छाँट करने की बात करने लगे।ऐसे अधम लोग ही किसी समाज के घातक होते हैं।अब तो यज्ञ में भी लोग अनेक मंत्रों को जोड़ने लगे हैं , जिन मन्त्रों से यज्ञ करना स्वामी जी ने कहीं लिखा ही नहीं है।ऐसे लोगों को ऋषि के लक्ष्य को पूरा करने वाल कहें या झूठे सम्मान में ऋषि के पद्धति को संशोधित करने वाले घातक शत्रु।आज हम इन्हीं महत्वाकांक्षा में आर्य समाज को कई भागों में बाँटकर रख दिये हैं। आपसी प्रतिद्वंदिता ने हमें अपने लक्ष्य से पीछे ढकेल दिया जिसके कारण हम उन्नति के जगह अवनति की ओर जा रहे हैं।हम जहाँ रहें एक अच्छे लक्ष्य को लेकर चलें अपने अहंकार को भूलकर चलें।सबको साथ लेकर चलें।अगर हम ऐसा न कर सम्मान और सम्पत्ति के झूठे अहंकार में जीना चाहते  हैं तो आप दयानंद स्वामी के शत्रु हैं क्योंकि उन्होंने दोनों को जीवन में स्थान ही नहीं दिया।

आज सम्पत्ति इकट्ठा करने की होड़ लगी हुई है।वह जीवन का लक्ष्य बन गया है, जो धन जीवन निर्वाह का साधन था वह साध्य बन गया।वेद भी कहता है” शत हस्त समाहर ” अर्थात् सैकड़ों हाथ से कमाओ लेकिन उसके आगे कहता है “सहस्त्र हस्त संकिर:” अर्थात् हज़ारों हाथ से दान करो। लेकिन दान की प्रवृत्ति से हम दूर भाग रहे हैं।दूसरे के धन को पाने के लिए गिद्ध दृष्टि लगाए हुए हैं जबकि यजुर्वेद कहता है ” मा गृध: कस्य स्विद्धनम्” अर्थात् किसी के धन की लालसा मत करो।जो चीज़ हमारे जीवन के सफ़र में साथ जाने वाला नहीं है, बाधक है ,उसे हम जीवन का लक्ष्य क्यों बनाएं।क्यों इसके आगे मूल लक्ष्य मोक्ष से मुँह मोंड़े।मोक्ष का अभिलाषी जो उसके लिए सतत प्रयत्नशील रहता है ,वही लक्ष्य का वास्तविकत अर्थ समझकर धन और सम्मान की अभिलाषा किए बिना समाज और परमात्मा दोनों का प्रिय होता है, जो जीवन का मूल उद्देश्य है,लक्ष्य है उसको चरितार्थ करता है।

 

अरुण कुमार आर्य

प्रधान

आर्य समाज मन्दिर

मुग़ल सराय, चन्दौली ।

 

 

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