#Lekh by Arun Kumar Arya

अभिनय

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किसी ने कहा है कि हम तो रंगमंच की एक कठपुतली हैं जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है।यह सोच उनका था अगर सब वही करा रहा है तो सब दोष उसी(ईश्वर) का है और दण्ड भी उसी को मिलना चाहिए क्योंकि सबका कर्ता धर्ता वही है।दूसरे ने कहा जीव कर्म करने में स्वतंत्र है लेकिन फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था में परतन्त्र है।यह बात जमती है कि जो जैसा कर्म करेगा उसे वैसा फल भोगना पड़ेगा।

हर व्यक्ति कुछ न कुछ कर रहा है,आवश्यक भी है। कुछ लोगों के जीवन वृत्तान्त को हम पढ़कर या सुनकर हम बहुत प्रसन्न होते हैं, क्या कभी हम सोचते हैं कि हमें भी कुछ बनना चाहिए।हम राजा हरिश्चन्द्र के सत्य और दान की गाथा गाते हैं ,दानवीर कर्ण , भामाशाह के त्याग की प्रशंसा करते हैं, देश के लिए मर मिटने वाले शहीदों पर गर्व करते हैं ,बहुत से ऋषि,महर्षि, ज्ञानी, विज्ञानी ,विद्वानों पर नाज करते हैं।क्या हम प्रशंसा, गर्व, त्याग की गाथा गाने तक ही अपने को सीमित रखेंगें या हम भी कुछ कर दिखाएँगें ? हमें तो ऐसा लगता है कि हम रंगमंच की कठपुतली हैं जिसकी डोर हमारे अन्दर के लोभ- मोह द्वारा दिशाहीन हो गया है।अध्यापक पढ़ा रहें हैं ,बच्चे पढ़ रहें हैं ,वक्ता उपदेश दे रहे हैं ,श्रोता सुन रहे हैं लेकिन व्यवहार में हम अपने को नहीं उतार पाते हैं। राजनीति के धुरन्धर राष्ट्र के प्रगति की बातें करते हैं लेकिन अपनी प्रगति में राष्ट्र का धन अपने खाते में जमा कर रहें हैं,राष्ट्र की सम्पत्ति का  भीषण दुरुपयोग कर रहें हैं, हर तरफ लूट मची हुई है ,सारे आदर्श कहने कहाने ,सुनने सुनाने के लिये हैं ठीक उसी तरह जिस तरह रंगमंच या चलचित्र का कलाकार हर प्रकार के अभिनय की अच्छी प्रस्तुति देता है उसका वह चरित्र केवल रंगमंच तक सीमित रहता है लेकिन अभिनय के पश्चात् उसका वह चरित्र नहीं रह पाता है।

हमें अभिनय नहीं करना है अपितु कथनी करनी में सामञ्जस्य स्थापित करना है।हमें अपने को केवल किसी की गाथा गाने तक सीमित न रखकर स्वयं को ऐसा बनाना है कि आने वाले कल की हम पहचान बन सके,वर्तमान हमारा सम्मान कर सके।

 

अरुण कुमार  “आर्य”

प्रधान, आर्य समाज मन्दिर

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