#Lekh by Avdhesh Kumar Avadh

स्वाधीन भारत एक भ्रम जाल बनकर रह गया

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

 

भाग – दो

 

भारत की आम जनता अपने परिजनों को गाजर – मूली की तरह कटते हुए देखकर स्वयं में कट रही थी। किसकी हत्या पर पहले रोये, यह भी सोचने का अवसर न था। मरी हुई औरतों की छातियों को रोते – बिलखते भूखे बच्चे दूध की लालच में नोचते थे और फिर किसी कुत्ते का ग्रास बन जाते थे। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि भौगोलिक सरहद से ज्यादा मनुष्य की देह बँटी थी। और हमारे नेहरू चाचा चित्कार को अनसुना करके लुई माउंट बेटन के साथ रासलीला रचा रहे थे। सवर्णों की छाती पर चढ़कर अम्बेदकर दलितों का भाग्य लिख रहे थे। शिक्षा मन्त्री अबुल कलाम आजाद इतिहास के साथ निकाह – तलाक का खेल खेल रहे थे। शेख अब्दुल्ला कश्मीर की कली मसल रहे थे। गाँधी बाबा उस राष्ट्र के राष्ट्पिता बन रहे थे जिसने उनके हजारों पूर्वजों की पीढ़ियाँ पैदा की है और इसके एवज में पाकिस्तान के लिए 20 किलोमीटर चौड़ा कोरीडोर देकर उत्तर भारत और दक्षिण भारत के रूप में एक और विभाजन की बुनियाद रख रहे थे। विनोबा भावे दान की ओट में भिक्षावृत्ति एवं अकर्मण्यता को कानूनी दर्जा दे रहे थे। राजेन्द्र प्रसाद 308 सदस्यों के मतभेद मिटाने में बेहाल थे। नाथूराम गोडसे साथियों संग तकरीबन 85 प्रतिशत जनता की सोच को अमलीजामा पहनाने में फाँसी चढ़ रहे थे। सरदार पटेल जिनकी सोच में अचानक बहुत बड़ा सकारात्मक परिवर्तन आया था, राष्ट्र निर्माण में लगे थे। श्यामाप्रसाद मुखर्जी भारतीय गणतन्त्र में विशेष कश्मीर से पासपोर्ट हटा रहे थे। सम्भ्रान्त जनता इन्दिरा – फ़िरोज के संतानों की जाति पर बहस कर रही थी। सेना अपने माथे पर जीप घोटाले का लगा टीका मिटा रही थी। पंचशील, वसुधैव कुटुम्बकम् और सत्यमेव जयते के बीच हमारा देश असन्तुलित विकास के साथ एक और युद्ध की ओर बढ़ रहा था, जो अकारण नहीं था।

 

सुराज की चाह में हम भटककर बहुत दूर चले गए और अंत में स्वराज लेकर संतोष करना पड़ा। लगभग 1200 वर्षों तक लगातार झड़प, अत्याचार और कमोबेश गुलामी से दो – चार होते – होते हमारा हौसला पस्त हो चला था। सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पतन एवं बलात् क्षरण ने स्वत: स्फूर्ति की ताकत को दीमक बनकर चाट लिया था। भावी को सोचने और समझने की क्षमता अवनति की ओर थी। निर्दयी आततायी और सदयी आततायी के दुष्चक्र से हम बाहर नहीं निकल पा रहे थे। मुखर विरोध छोड़कर प्राथना पत्र और दया याचिका की मंजूरी को अपना परम सौभाग्य समझने वाला उससे आगे सोच भी क्या सकता है! इसी कारण वश सुराज के बदले स्वराज पाकर हम संतुष्ट नज़र आए।

 

अवसरवादी भिखमंगे पाकिस्तान और कंगाल पूर्वी पाकिस्तान ने अपनी भूखी आबादी को भारत का रास्ता दिखाया। नेपाल, बर्मा, भूटान आदि ने भी प्रत्यक्ष या परोक्ष पकड़े जाने पर शरणार्थी और न पकड़े जाने पर घुसपैठिये के रूम में इस भूमि का इस्तेमाल किया। हमारी राज्य और केन्द्र की सरकारे रिजर्व वोट बैंक मानकर सावधि विकल्प के रूप में अघोषित न्योता देती रहीं। विशेष मज़हब का होने के कारण ये ‘हम दो, हमारे दो’ से साधिकार खुद को बाहर रखे। बौद्ध आसक्ति, गिरजा प्रेम और कम्यूनिज्म नकारापन देश के भीतर विदेश की बुनियाद रखने में सफल हुआ। हमारा लोकतन्त्रात्मक संविधान आदर्शवाद का फंदा गले में डाले रहा और ये आस्तीन के साँप मन मुआफ़िक फंदे को खींचते रहे। ‘भीड़’ ने चतुराई से ‘लोक’ का स्थान हड़प लिया और हम भीड़तन्त्र को आँख बंदकर लोकतन्त्र मान बैठे।

 

भारत जैसे देशों में कितना लाचार होता है लोकतन्त्र, कभी भी देखा जा सकता है। चूँकि जनप्रतिनिधियों का चुनाव जनता द्वारा होता है, जो येन केन प्रकारेण बहुमत जोड़कर सरकार बना लेते हैं, इसलिए ये सदैव जनता के हाथों की कठपुतली होते हैं। जनता जब वोट बैंक बनकर अपनी माँग रखती है तो ये जनप्रतिनिधि माँग के औचित्य पर विचार किए बिना ही आगे बढ़कर समर्थन कर देते हैं। ऐसे में देश का सारा दारोमदार जनता पर होता है। बहुसंख्यक जनता जैसा चाहती है, जनप्रतिनिधि या सरकारें वैसा ही करने का प्रयास करती हैं। अत: किसी भी जनप्रतिनिधि या पार्टी या सरकार का दोष देने से पहले जनता को अपने गिरेबान में झाँक लेना चाहिए।

 

सब मिलाकर लोकतन्त्र वह बहुधारी औजार है जिसका प्रयोग जनता की बहुसंख्या के विवेक पर निर्भर करता है। अपनी अपेक्षा व सुविधा के अनुसार इसका सदुपयोग या दुरुपयोग कर सकते हैं अगर हमारे साथ बड़ी संख्या हो तो। इसी कारण से प्रतिनिधि, पार्टी  या सरकारें बेधड़क वोटबैंक के पीछे दौड़ती हैं चाहे लोकतन्त्र की भावनाओं की हत्या ही क्यों न करनी पड़े। बाहरी घुसपैठिये या शरणार्थी इसी रणनीति के महत्वपूर्ण भाग हैं।

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

मो० नं० 8787573644

(Mr. Awadhesh Kumar)

Engineer, Plant

Max Cement, GVIL

4th Floor, LB Plaza

GS Road, Bhagavath

Guwahati -781005 (Assam)

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