#Lekh by Avdhesh Kumar Avadh

स्वाधीन भारत एक भ्रमजाल बनकर रह गया

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

 

भाग – तीन

 

दो देशों के भातृत्व प्रेम का सर्वाधिक अप्रत्याशित परिणाम सामने आया चीन द्वारा भारत पर आक्रमण के रूप में। सिर्फ शान्ति के कबूतर उड़ाने से देश की सम्प्रभुता नहीं बचाई जा सकती, सिखा गया यह अचानक का युद्ध। हमने तो इस दिशा में कभी सोचा भी नहीं था कि हम जिसे भाई कहकर धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवहार बढ़ा रहे हैं, वह पेट में खंजर छुपाकर अनुकूल बहाने की तलाश में है। बौद्धगुरु दलाईलामा हमारे मेहमान हुए और तिब्बत चीन के कब्जे में। आयुधों की कमी के चलते हमारे जवानों की जवानी कुर्बान होती रही……हम पीछे हटते रहे। अन्तत: युद्धविराम की घोषणा के साथ हमने अरुणाचल के सीमावर्ती भू भाग को चीन बन जाने दिया। दिनकर जी की लेखनी कुपित होकर परशुराम को पुकार उठी किन्तु नेहरू जी मातृभूमि का अंश खोकर भी दुखी नहीं हुए।

 

भारत – चीन युद्ध ने हारे हुए भारत को बहुत कुछ सोचने, सीखने एवं सुधारने के लिए प्रशस्त किया। कबूतरबाजी कम हुई। पंचशील एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की पुन: समीक्षा हुई और हम गाँधी की अहिंसा से बाहर निकलकर कृष्ण की अहिंसा की ओर बढ़े…..। अब हमारे गाल चाटे खाने के लिए नहीं रहे बल्कि एक चाटे के बदले दो चाटे लौटाने की सोच विकसित हुई। सैन्य आयुध में भी आत्मनिर्भरता की ओर हम अग्रसर थे। 1965 में पाकिस्तान भी पुराने घावों पर मरहम लगाकर सीमा पर आ धमका। वह समझ नहीं पाया था कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और लालबहादुर शास्त्री की जोड़ी भारत सरकार में है जो त्वरित निर्णय लेने में सक्षम है। हमारी सेना यह युद्ध पूरी स्वतन्त्रता और सम्पन्नता से लड़ी। पाकिस्तान सिमटता चला गया, अस्तित्व बचाना भी मुश्किल हो गया था। यह लड़ाई बराबरी की नहीं थी। युद्ध विराम के बाद ताशकंद में समझौता के लिए शास्त्री जो को आमन्त्रित किया गया ।

 

के कामराज जैसे अध्यक्ष किसी पार्टी में हों तो क्या कहने! संगठन को मजबूत करने के लिए सत्ता का मोह न करने की नसीहत काबिले तारीफ़ हो सकती है अगर साथ में ईमानदारी भी हो। मगर कामराज को एक आम भारतीय पार्टी के भीतर वरिष्ठता क्रम से बलात्कार के कारण ज्यादा जानता है। इसका नतीजा निकट भविष्य में देश को भुगतना पड़ा।

 

विश्व की दोनों महाशक्तियाँ भारत के इस रौद्र रूप को देखकर सहमी हुई थीं और साथ ही कांग्रेस का एक धड़ भी जिसे आशा न थी कि लालबहादुर सच में ‘लाल’ साबित होगा। धर्मपत्नी ललिता शास्त्री जी जो सदैव शास्त्री जी की परछाईं बनी रहती थीं, तत्कालीन परिवेश में उनके साथ नहीं गईं। शास्त्री जी बेहद दु:ख के साथ यह कहकर रवाना हुए कि ‘जीती हुई भूमि अगर वापस करनी पड़ी तो शायद हम जिंदा न रह सकें’ और कुटिलों ने इसी का फायदा उठाया। ताशकंद से शास्त्री जी का शव और भूमि वापसी का निर्णायक प्रपत्र आया। सहज ही समझा जा सकता है कि लाभ के भागीदार बाहर और भीतर कौन लोग हुए! सुभाष की तरह शास्त्री का अंत भी रहस्य के आगोश में छुपा दिया गया।

 

पंचवर्षीय योजनाएँ और सहायक रूप से एक वर्षीय योजनाएँ चलती रहीं। शास्त्री जी की हरित क्रान्ति संग जय जवान – जय किसान बहुत कारगर हुआ। इन्दिरा जी का सप्ताह में एक दिन उपवास का आह्वान भी भारतीयों का संयम दुनिया को समझा गया। इन सबके बावजूद भी समाज की आर्थिक रूप से अन्तिम पंक्ति इन सबसे अछूती रही। विकास के सपने बिनु पूरा हुए ही दम तोड़ते रहे। सामाजिक बुराइयाँ और जहन में बैठी कुरीतियाँ जगह छोड़ने को तैयार न थीं।

 

सन् 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में विरोध की ज्वाला भड़क उठी थी। प्रधानमन्त्री इन्दिरा जी ने न केवल आग में घी डाला बल्कि सहयोग के नाम पर पाकिस्तान को यहाँ से खदेड़ने का मन बना चुकी थीं। पूरा भारत इस प्रायोजित सुअवसर पर एक नज़र आया मुट्ठी भर सपोलों को छोड़कर। परिणाम भारत की योजना और चाहत के अनुरूप रहा। 13 दिवसीय युद्धोपरान्त पाकिस्तान विभाजन सफल रहा, पूर्वी पाकिस्तान बन गया बांग्लादेश। इसका दूसरा पहलू यह था कि लाखों की तादात में घुसपैठिये हमें जीत में उपहार स्वरूप मिले जो पार्टी विशेष के लिए वोटबैंक बन गए। जयप्रकाश – लोहिया राजनीति में सक्रिय हो गए थे। परिवारवाद में समाजवाद की भूमि तलाश रहे थे। कुपित होकर आयरन लेडी ने लोकतन्त्र के ऊपर आपातकाल को थोप दिया। यह भारतीय लोकतान्त्रिक इतिहास का सबसे स्याह अध्याय है। सरेआम लाठियाँ बरसायी गईं। जेल में जनप्रतिनिधि जानवरों की तरह ठूसे गए। कुछ तो भारत के पड़ोसी देशों में शरणार्थी या अनचाहे अतिथि बन गए। और इस तरह 1977 आया जिसमें पहली बार भारत में तीस वर्षों के बाद गैर कांग्रेस सरकार आई। समाजवाद – जनसंघ का संयुक्त प्रयास यह करिश्मा करने में सफल रहा। मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह का नाम भी प्रधानमन्त्रियों की सूची में जुड़ गया। जेपी की क्रान्ति का आपसी सत्ता लोलुपता ने असमय दुखद अन्त कर दिया। इन्दिरा के छोटे पुत्र संजय गाँधी भी राजनीति में जगह बनाने लगे थे। अंग्रेजों की राह पर चली कांग्रेस मात्र तीस सालों में सत्ता के बाहर थी, यह बात उन्हें पच नहीं पा रही थी। संजय ने आगे बढ़कर राजपरिवारों को केन्द्रीय राजनीति में आमन्त्रित किया। उनका प्रयोग सफल रहा और पुन: कांग्रेस की सरकार बड़े बहुमत से गठित हुई।

 

संजय – इन्दिरा का आपसी सम्बंध खटास भरा था और इसी दौरान विमान दुर्घटना में संजय की मौत बड़ा सदमा था। भारत की बेलगाम बढ़ती आबादी को देखते हुए ‘हम दो – हमारे दो’ परिवार नियोजन का स्लोगन चरम पर था जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर फेल हो गया। डॉक्टरों ने खूब काली कमाई के बाद फर्जी बंध्याकरण सर्टिफिकेट बेचे। फलत: यह मुहिम भी ठंडी पड़ गई। असंगठित विपक्ष आपसी खेमेबाजी का शिकार होता रहा। कभी बाढ़ और कभी सूखे का प्रकोप भारत की नियति बन गया। इन्दिरा गाँधी की क्षत्रछाया का दुरुपयोग करके भिंडरावाला पंजाब की भूमि पर एक नासूर बन गया था। स्वर्ण मन्दिर जैसा पवित्र स्थान हथियार के जखीरे के रूप में तब्दील था।

 

धार्मिक स्थल की आड़ में सरकार को अलगाव की चुनौती देना देशद्रोह से कम नहीं। ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत सैन्य कार्यवाही हुई। ऑपरेशन सफल रहा। लेकिन स्याह परिवेश भाईचारे को निगलने लगा। एक दमदार प्रधानमन्त्री के रूप में प्रतिष्ठित श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या का अमिट दाग सुरक्षाकर्मी पंजाबियों के सर लगा। तदुपरान्त पूरा देश विद्वेष की अग्नि में दहक उठा। मॉब लिंचिंग का विद्रूप परिणाम सामने आया। एक खास बात और जोड़ सकते हैं कि भारत की बढ़ती आबादी को लेकर हम दो हमारे दो का कुछ वक्त तक कठोर कदम उठाने वाली सरकार घुसपैठियों को लेकर सदैव नरम रुख में दिखी जो अनियन्त्रित आबादी के वाहक हैं। सदा की ही तरह एक बार फिर से लोकतन्त्र को धता बताते हुए वरिष्ठता व अनुभव के पैमाने को दरकिनार करके राजीव गाँधी के हाथों में सत्ता सौंपी गई। जनता की कराह से सरकार को कोई सरोकार नहीं था।

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

मो० नं० 8787573644

(Mr. Awadhesh Kumar)

Engineer, Plant

Max Cement, GVIL

4th Floor, LB Plaza

GS Road, Bhagavath

Guwahati -781005 (Assam)

 

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