#Lekh by Avdhesh Kumar Avadh

अंग्रेजों से लोहा लेना वाला मेघालय का गुमनाम सपूत

 

भारत वर्ष के पूर्वोत्तर को वर्तमान समय में सात बहनों का प्रदेश (सेवेन सिस्टर्स) कहा जाता है। यह दुनिया में वर्षा के लिए विख्यात मेघों का आलय भी है जिसे मेघालय कहते हैं। राजनीतिक उतार – चढ़ाव में मेघालय का भू – भाग कभी असम तो कभी बंगाल से जुड़ता और बिछुड़ता रहा किन्तु इसका स्वायत्त अस्तित्व सदैव कायम रहा और आज भी है। अंग्रेजों के साम्राज्य में जब सूर्य अस्त नहीं होता था, लगभग सारी दुनिया उसके परचम तले रहने को विवश थी उस समय मेघालय भी इस प्रकोप से अछूता न रह सका था। सन् 1835 में जेंतिया साम्राज्य पर भी अंग्रेज कब्जा करने में सफल हो गए थे। लेकिन एक बच्चा अपनी नंगी आँखों से यह सब देख रहा था जो आने वाले समय में अंग्रेजों की लंका का हनुमान बना था।

 

वह बच्चा कियांग नागबाह था जो एक ऐसे साधारण किसान के घर में जन्म लिया था जिसे उसके जन्मदिन की भी कोई जानकारी नहीं थी। शिलॉंग से लुम्सनांग के रास्ते में जोवाई नामक शहर अवस्थित है जिसके तपेपले में रिमाई नांगबाह नामक गाँव में सुप्पो वंशीय कियांग का जन्म हुआ था। बचपन से ही इस बालक पर इसके मामा उसान साजर नांगबाह का विशेष प्रभाव पड़ा था। परिणाम स्वरूप अंग्रेजों के खिलाफ यह बालक बगावत पर उतर आया था।

 

बिजनेस के उद्देश्य से आये अंग्रेज अक्सर धन और शक्ति के पीछे पड़ते थे । जन साधारण को उकसाने से प्राय: परहेज ही करते थे। इसीलिए रीति- रिवाज एवं धार्मिक भावनाओं से छेड़छाड़ नहीं करते थे। किन्तु सच ही कहा गया है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि। जब अंग्रेजों के खिलाफ मंगल पाण्डे की अगुवाई में सैनिक विद्रोह हुआ था और सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की नींव पड़ी थी, उसका असर मध्य भारत से होता हुआ मेघालय तक आया था। अंग्रेजों के प्रति लोगों में असहयोग विरोध और घृणा की भावना पनपने लगी थी।  इसी कड़ी में सन् 1859 में अंग्रेजी हुकूमत का कर, कस्टम, गृहकर एवं धार्मिक क्रियाकलापों, आस्थाओं एवं त्योहारों में हस्तक्षेप बढ़ने लगा। पहले गिने – चुने लोग गुलामी के खिलाफ आवाज उठाते थे लेकिन इन हस्तक्षेपों के कारण जन आक्रोश बढ़ने लगा। जनता ने समझ लिया कि इन कुत्सित गतिविधियों का अभिप्राय अंग्रेजी हुकूमत को परोक्षत: सर्वोच्च साबित करना है। परिस्थिति इतनी प्रतिकूल बनी कि दूरदर्शी युवा कियांग का खून खौल उठा।

 

कियांग ने खुलेयाम सख्त लहजे में कहा था, “मूल निवासी विदेशियों को कर नहीं देते हैं…।” अंग्रेजों का सितम बढ़ता ही जाता था। सन् 1855 में अंग्रेजों ने जोवाई की पहाड़ी पर एक पुलिस स्टेशन स्थापित किया था जो दशर कबीले के श्मशान के बिल्कुल निकट था। इसे स्थानीय लोगों की तौहीनी के रूप में देखा गया। मिशनरियों द्वारा ब्रितानियों के पक्ष में शिक्षा की धारा को मोड़ने के लिए स्कूलों की स्थापना नागवार गुजरता था। “ख्लू लैंगदोह” की पवित्रता और अन्य धार्मिक त्योहारों को अंधविश्वास का नाम देना अंग्रेजों के खिलाफ जनता को सामने लाकर खड़ा कर दिया था।

 

जन आक्रोश इस कदर बढ़ने लगा कि जगह – जगह मीटिंग रखी जाने लगी थी। जनता का हुजूम बढ़ता जा रहा था। 12 दरबार के दलोई ने एकमत से कियांग को अपना नेता चुना था। अंग्रेजी हुकूमत से गोरिल्ला युद्ध करना तय हुआ था। गोरिल्ला युद्ध इसलिए क्योंकि अंग्रेजों के मुकाबले अपनी सैन्य व आयुध क्षमता बहुत कमतर था। भोजन और हथियार की व्यवस्था की जाने लगी थी। अंग्रेजों के पास अत्याधुनिक हथियार थे । उनके मुकाबले आग्न्येयास्त्र बनाये गए। अंग्रेजों की तोप के गोलों और  बंदूक की गोलियों से बचने के लिए शरीर पर केले के तनों का कवच बाँधा जाने लगा था जिसका कुछ हद तक लाभ भी मिलता था। इन तैयारियों के साथ वीर कियांग के नेतृत्व में जोवाई पुलिस स्टेशन को जला दिया गया। बिल्कुल चौरीचौरा कांड की पुनरावृत्ति हुई थी। अंग्रेजों के लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित था। फलस्वरूप चैन मिर्सियांग नामक स्थान पर भीषण युद्ध हुआ ।

 

लगातार छिटपुट लड़ाइयों के दरम्यान कियांग बीमार पड़ गए। आन्दोलन नेतृत्व विहीन हो गया । क्रांतिकारियों की कमजोरी के बीच अंग्रेजों की ताकत बढ़ती गई। 27 दिसम्बर सन् 1862 को अंग्रेजी सेना ने नांगबाह पर कब्जा कर कियांग को गिरफ्तार कर लिया था। लोगों को इस बात की खबर लगे, इससे पूर्व ही आनन – फानन में मुकदमा चलाकर 30 दिसम्बर 1862 को मात्र 3 दिनों के भीतर फाँसी दे दिया गया। क्रान्तिवीर कियांग को इस बात का पूर्वाभास था कि उनको एक न एक दिन शहीद होना है। उन्होंने कहा था कि,’ मरते समय उनका सिर पूरब की ओर लटके तो समझ लेना कि स्वाधीनता एक सौ वर्ष के पहले मिल जाएगी और यदि सिर पश्चिम की ओर लटके तो समझना कि स्वाधीनता प्राप्ति में विलम्ब है।’ कथन सत्य हुआ । यह अद्वितीय शहीद सदा के लिए सो गया और आजादी 85 वर्षों में ही मिल गई।

 

सन् 1947 में भारत को आजादी मिली जो गाँधी जी की आँधी में उड़कर नेहरू जी की रखैल बन गई। कांग्रेस ने पैत्रिक सम्पत्ति समझकर पूरा दोहन किया। इतिहास सफेदपोश काले अंग्रेजों की बिरुदावलि बनकर रह गया। सन् 1857 से सन् 1930 तक का संग्राम और फिर नेताजी सुभास चन्द्र बोस का बलिदान ऐतिहासिक भूल से अधिक नहीं दर्शाया गया। वीर सपूत कियांग का बलिदान भी नेहरूवादी कांग्रेस में विलुप्त हो गया था। सन् 2001 में एन डी ए की सरकार के मुखिया श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अतीत की ओर पलटकर देखा और एन सी ई आर टी को निर्देश दिया कि पाठ्यक्रम में शहीदों को शामिल किया जाए, जो पुन: कांग्रेस सरकार की भेंट चढ़ गया। सन् 2001 में इस महान क्रान्तिकारी के नाम पर तत्कालीन सरकार ने डाकटिकट जारी किया । मेघालय राज्य इस महान योद्धा की दर्जनों प्रतिमाएँ स्थापित कर कृतज्ञता ज्ञापित करता है। यहाँ की मनोहर वादियाँ भारत के इस महान वीर सपूत के बलिदान की साक्षी हैं।

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

मैक्स सीमेंट, मेघालय

918787573644

(Mr. Awadhesh Kumar)

Engineer, Plant

Max Cement, GVIL

4th Floor, LB Plaza

GS Road, Bhagavath

Guwahati -781005 (Assam)

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