#Lekh by Arvind Jain

अपसंस्कृति एवम उससे मुक्ति के उपाय

आज इस विषय पर बहुत चर्चा हैं कि हम किस दिशा में जा रहे हैं ,युवा वर्ग में भटकाव हैं .दिशाहीन हैं और पश्चिमी सभ्यता ने हमें बहुत नुक्सान पहुचाया हैं .क्या हमें पश्चिमी संस्कृति का अनुपालन करना चाहिए.? क्या भारतीय सभ्यता परिपूर्ण नहीं हैं ? क्या हमारे माता पिता अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन ठीक से नहीं कर रहे हैं ? क्या हमारा परिवेश ,परिजन दिशा से भटक गए या हमारी शिक्षा पद्धति में कही चूक हो रही हैं ? हमें किसको अपना आदर्श बनाना चाहिए ? क्या परिवार ,शिक्षा या माहौल में गिरावट आ गयी ?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें खोजना हैं .वैसे ये प्रश्न हमेशा युग के साथ चलते रहे क्योकि दो पीढ़ियों में अंतर ,और सोच का तरीका अलग .वर्तमान में आधुनिक यांत्रिक यंत्र बहुलता से उपलब्ध होने से जानकारियों का आदान प्रदान बहुत सुगम और त्वरित होने से आज कि पीढी बहुत अधिक इस पर आश्रित हो चुकी .आदर्श मूल्यों का स्थान शून्य होता जा रहा हैं . जिससे चारित्रिक ह्रास बहुत होता जा रहा हैं .ये सब विषय इतने विस्तृत हो चुके कि इनको समेटना बहुत कठिन तो नहीं हैं पर कर पाना सरल नहीं .

क्या हम वर्तमान से बच सकते हैं ?नहीं  तो फिर इस पर चिंतन क्यों ? चिंतन से कुछ हल निकल सकता हैं सम्भतः नहीं .हल निकलेगा क्रियान्वयन से …कौन करेगा शुरुआत ? संस्कृति की दुरावस्था का रोना रोने से कुछ नहीं होना हैं . इस समय हम किसको दोष दे ,संतानो को, माता पिता को ,शिक्षक को , शिक्षा प्रणाली को , आधुनिकता को .या उपलब्धता को. क्या कोई आज टी, वी.,मोबाइल,लेपटॉप ,के उपयोग से बच सकता हैं ,उत्तर नहीं में होगा. क्योकि यह आज कि आवश्यकता हैं ,इसका उपयोग न करने पर आप पिछड़ जायेंगे.

इसकी शुरुआत हमें घर से करनी पड़ेगी. घर का वातावरण शुद्ध को यानि परिवार जन संस्कारित हो. माता पिता को आदर्श प्रस्तुत करना होगा ,ऐसा नहीं कि घर में फ़ोन आया कि पापा से बात कराओ और पाप ने बच्चे से कहा कह दो  पाप नहीं हैं तो बच्चे ने कह दिया कि पापा ने कहा हैं वे घर पर नहीं हैं . ये चरित्र का परिहार करना होगा इसे त्यागना होगा. यहीं संस्कार बच्चे में पालते हैं .माँ बाप को अपनी सीमाएं में रहकर जीवन का क्या उद्देश्य हैं यह समझाना चाहिए. आप मात्र पैसा कमाने कि मशीन न बन कर अच्छे नागरिक बने. अपनी मातृ भाषा ,अपने धर्म ,अपने इतिहास पर गौरव का भाव होना चाहिए . अन्य भाषा हमारे लिए सीखना जरुरी हैं पर अपनी भाषा पर हमें गर्व होना चाहिए. बड़े दुःख का विषय हैं कि लगभग सौ वर्षों से राष्ट्रभाषा स्थापित करने का प्रयास चल रहा हैं पर भारत कि राष्ट्र भाषा अभी तक निर्धारित नहीं हुई क्यों ?

परिवार से ही चरित्र का ,नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता हैं . उसके बाद शिक्षक का कर्तव्य हैं कि वह भी निर्धारित मानदंडों  का पालन कर शिष्य को आदर्श प्रस्तुत करे. ऐसा नहीं मात्र वेतन पाना और अपनी ड्यूटी करना . अच्छे गुणों का अभिर्भाव यही से होता हैं .पर शिक्षक गुणवान हैं तो उनसे प्रभावित हुए बिना शिष्य नहीं रह सकता. शिक्षा का वातावरण पवित्र हो . पर शिष्य और शिक्षक दोनों में बहुत अंतर हैं . इस कारण उनमे अच्छे संस्कारों का अभाव होता जा रहा हैं. . इस बिंदु पर गंभीर चिंतन कि जरुरत हैं .शिक्षा मात्र डिग्री प्राप्त कर नौकरी पाने तक सीमित हो गयी, गुणवत्ता शुन्य होने से उनमे आत्मविश्वास कि कमी .

आर्थिक सम्पन्नता और भौतिकवाद के कारण भोगवादी प्रवत्ति बहुत बढ़ गयी हैं .आज खान पान ने दूषित मानसिकता को जन्म दिया. रासायनिक साधनों का अधिक  उपयोग होने से और रेडीमेड  खाना पीना पहनना होने से अधिक कमज़ोर होते जा रहे हैं नवयुवक , और आर्थिक सम्पन्नता के लिए अब नैतिकता ,चरित्र , ये शब्द अब शब्दकोष कि शोभा बढ़ा रहे. आज किसी को सलाह देना या संस्कार देना दकियानूसी ख्यालात के लक्षण माने जाते हैं .

इन सबका इलाज़ असाध्य होता जा रहा हैं पर इलाज़ ढूढना होगा. सबसे पहले बच्चों को धार्मिक शिक्षा देनी चाहिए. और उसे योग्य गुरु के समक्ष कुछ नियम लेना चाहिए. जिससे वो अपनी सीमा का उल्लंघन न करे. दूसरा उसके क्रिया कलापों पर निगाह रखे . स्कूली शिक्षा के साथ कुछ ऐसा व्यवहारिक ज्ञान दे जिससे वह स्वाबलबी बन सके और वह भी आगे चलकर पिता बनेगा तो भावी संतान को वह आदर्श गुण दे सके ,उसे यह समझाना और हमें समझना चाइये कि मानव जीवन खाने पीने के लिए नहीं बना हैं ,मानव मानवता के गुणों का विकास करे. वह मानव बने .दानव न बने. वर्तमान दौर पूर्णतय दानव बनने की दिशा में अग्रसर हो रहा हैं . यह समझ लेना आवश्यक हैं की मारने के बाद ये सब दौलत , धन वैभव कोई साथ नहीं जाएंगे बस जायेगा  तो आपके द्वारा किये गए कर्म . तो हमें निर्भय बनाना हैं पर इतने निरंकुश नहीं की हम अपनी सभ्यता को छोड़ दे.

हम आधुनिकता की चका चौन्ध में अपनी मर्यादा छोड़ दे और फिर हमें पछताना पड़े जैसे आज भटक रहा है पूरी मानव समाज . मात्र क्षणिक सुख के लिए मृग मरीचिका जैसे दौड़ते है और फिर खाली हाथ लौटते हैं . समय का सदुपयोग अर्थ के साथ मन को शांत करने में जरूर लगाए .ऐसा न होवे की हम पश्चिमी सभ्यता को अंगीकार कर नशे के आदी बन जाए. जन्म और म्रत्यु के बीच का जीवन सुखमय हो यही कामना करता हूँ .

डॉक्टर अरविन्द जैन प्रान्तीय अध्यक्ष लेखक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश और शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

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