lekh by Beena Sharma

————किसान ———–
वाह वाही अपनी लूटती
राजतंत्र की लालसायें।
दिन व दिन चल रहीं घिनौनी चालबाजियाँ……

स्वभाव से सीधे सरल कृषक समाज को।
नित नित नये प्रलोभन देकर आकर्षित अपनी ओर करते
देखने सुनने को अक्सर मिल रहीं…….. दर्दनाक घटनायें।
फेंके इनके सुन्दरी जालों में वो अक्सर फस जाता।

गाँव समूह में रहकर सामाजिक जीवन जीने वाला।
कहाँ जान पाता इनकी सियासी चालें।

चढ़ जाता एक दिन, पेड़ की शाखा पर किसान भोला भाला।
निर्दयी चपल चालाक…….. ये
पासें पे पाँसा फेंकते, उल्लू बस अपना सीदा करते।
उसके किये प्रदर्शन को अधिकार समझते अपना।

बिडंबना तो देखो…………………
घटना एक घटकर, दुर्घटना का रूप लेती।
जीते जागते हसते गाते एक कृषक की मौत होती।

देखकर अप्रत्याशित अनहोनी को….. अनदेखा करते।
मंचासीन नेता सारे, सियासी चालें चलते।

मर गई आत्माएं इनकी खून पानी हो गया है।
गले में  पड़ा फन्दा उसका …….
सियासत की ही कड़ी लगता।बारी इन्साफ दिलाने की आती।
ये बस……..बगलें झांका करते।
काना फूंसियाँ करते………… दोषारोपण इक दूजे पे करते।

कौन देगा हिसाब बोलों, उसकी बेगुनाही का।
ये सियासतगारों……. अब
चुप क्यों? हो बोलों…….

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