#Lekh by dinesh pratap singh chauhan

एक अद्वितीय पुस्तक जो प्रसिद्द नहीं हो पायी
बिना पैसे दुनिया का पैदल सफर -लेखक -सतीश कुमार
1966 में हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा  प्रकाशित यह पुस्तक दो नौजवानों  सतीश कुमार व प्रभाकर मेनन की परमाणु आयुधों को समाप्त कराने की अद्वितीय महती किन्तु लगभग असंभव भावना को लेकर की गयी बापू की समाधि दिल्ली  के राजघाट से आरम्भ करके पाकिस्तान,अफगानिस्तान,ईरान ,सोवियत संघ ,पोलेंड ,जर्मनी, बेल्जियम,फ्रांस,ब्रिटेन, अमेरिका,जापान तक की लगभग आठ हजार मील की साहसिक पदयात्रा की कथा है वह भी  एक भी पैसा जेब में साथ रखे बिना। इस यात्रा में पेरिस में इन्हें जेल की हवा खानी पड़ी और अमेरिका में पिस्तौल का निशाना बनते  बनते  बचे। दुनिया  के एक सिरे से दूसरे सिरे तक   की इस पदयात्रा के संस्मरण और अनुभव जितने रोमांचक हैं उतने ही प्रेरणादायक भी हैं। पूरी पुस्तक पढ़ते हुए शायद ही कोई पाठक ऐसा हो जिसकी कई स्थानों पर आँखें न भर आती हों। सरल भाषा में यात्रा का मार्मिक चित्रण व् मानवीय संवेदनाओं और भावों का उद्वेग इस पुस्तक की विशेषता है। सामान्य ज्ञान के लिए भी इस पुस्तक का उपयोग इसकी अतिरिक्त विशेषता  कही जा सकती है।                 इस पुस्तक के      कुछ उद्धरण पाठकों को इसे पढने के लिए अवश्य ही प्रेरित व् उत्साहित करेंगे।
” जब बापू ने हिन्दुओं और मुसलमानों को  मिलकर रहने   के लिए कहा तो एक हिन्दू ने उन्हें गोली  से उड़ा दिया जब केनेडी ने काली और गोरी चमड़ी के लोगों को मिलकर रहने के लिए कहा तो एक गोरी चमड़ी वाले ने उन्हें भी गोली से उड़ा दिया। समाज को आगे खींचने के लिए जब  जब कोई व्यक्ति प्रयत्न करता है तब तब समाज की कुछ प्रतिगामी शक्तियां उसे रास्ते से हटा देती हैं। ”
“थोड़ी देर बाद उस पठान ने एक दार्शनिक की भांति कहा पता नहीं किसने इस बन्दूक को बनाया अगर यह बन्दूक बनायी ही नहीं  जाती तो हमारे मनों में डर  क्यों पैदा होता ?आदमी आदमी की जान लेने को क्यों लपकता ?आज बन्दूक के बल पर आदमी आदमी पर हक़ चलाता है।  बन्दूक न  होती तो प्यार के बल पर हक़ चलता जैसे बाप का बेटे पर चलता है ,भाई का भाई पर चलता है ,मित्र का मित्र पर चलता है,पति का पत्नी पर चलता है। जिसने बन्दूक बनायी उसे क्या इस बात की कल्पना भी थी कि इस बन्दूक का इस्तेमाल अब्राहम लिंकन ,महात्मा गांधी और जॉन केनेडी की छाती पर भी होगा। काश बन्दूक को अच्छे और बुरे का विवेक होता या फिर काश किसीको बन्दूक बनानी ही न आती”
” एक दिन पदयात्रा में हमें किशोर  उम्र के तीन लडके मिले। तीनों के हाथ में खेलने की बड़े आकार की बन्दूक !हमने पट पट की आवाज सुनी तो उनसे पूछा क्यों भाई क्या करोगे इस बन्दूक का ?अपने दुश्मन को मारेंगे -लड़कों ने उत्तर दिया। कौन है तुम्हारा दुश्मन ?लडके एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। जानते हो अपने दुश्मन को?नहीं -लडके बोले। सचमुच कोई नहीं जानता कि उनका दुश्मन कौन है ?दुश्मन हवा मैं खड़ा किया जाता है।”
दिनेश प्रताप सिंह चौहान

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