#Lekh by Dr. Arvind Jain

चुनाव

आजकल चुनाव का माहौल बहुत गर्म हैं ,वैसे भारत चुनाव प्रधान देश हैं हर बात  में चुनाव होता ही हैं कुछ को छोड़कर , लोकसभा ,विधान सभा ,नगर निगम ,नगर पालिका ,जनपद पंचायत ,ग्राम पंचायत ,सरपंच ,पञ्च ,इसके बाद कई बैंकों के चुनाव और फिर नेता का चुनाव ,प्रतिपक्ष के नेता का चुनाव ,कोई मर गया तो उप चुनाव बहुमत से हार गए तो मध्यावधि चुनाव. ये कुछ नमूने हैं देश के. हां हमें अपने माँ के चुनाव करने का हक नहीं पिता कभी कभी माँ के पसंद के हो जाते हैं ,बाकी तो दोनों का चुनाव करने का हक़ हमें नहीं हैं ,क्या यह भी होना चाहिए ? हाँ अब जन्म का चुनाव माँ बाप अपने हिसाब से शुभ मुहूर्त में कराने लगे. जैसे १२/१२/ १२ को शादियां खूब हुई ,बच्चे भी हुए . और बहुत से काम हुए ,कई प्रेमी प्रेमिका ने  इस दिन को ऐतहासिक दिन बनाया ,

हां   राजनैतिक पार्टियों का विशेष हवन और उसकी आहुति देने का वक़्त चुनाव होता हैं .ये  दिन पुण्य पर्व माना जाता हैं .हमारे यहाँ जब चुनाव होते हैं तब मेढक जैसे कुछ नए नेता उभर आते हैं जैसे नागपंचमी के समय बहुत से नए पहलवान नए नए लंगोट या जांघिया लेकर  अखाड़े की मिटटी से अपने को धन्य करते हैं और उसके बाद गधे की सींग के सामान अगोचर हो जाते हैं .इसी समय चुनाव के आया राम गया राम  जैसे चोला बदलते रहते हैं . कई तो पुराणी पार्टी को ऐसे छोड़ देते हैं जैसे बीबी से तलाक लेते समय सब कुछ गलत और अवगुन दिखाई  देते हैं .जबकि शादी के पहले खुद देखने गए , शादी के लिए सैकड़ों लोगों को लेकर गए कारण अकेले में डर लगता हों .फिर बाल बच्चे धड़ल्ले से पैदा किये और फिर मन भर गया या पत्नी ने कह दिया पहला लड़का आपका नहीं हैं हम तो मायके से लेकर आये थे तो वैराग्य हो जाता वैसे ही पुराणी पार्टी छोड़कर नए पार्टी में आते हैं .कभी कभी पुराणी पार्टी में अग्रिम पंक्ति   में बैठे और अब पिछली सीट पर . पर इस आशा से की कोई नयी  बधु मुझे अंगीकार करले .

पहले चुनाव में प्रत्याशी पार्टी  प्रधान  होता  था  अब व्यक्ति प्रधान ,जिस पार्टी या व्यक्ति का दबदबा चलरहा हो उसमे घुस जाते .उस समय यह नहीं देखते की इन्होंने हमें या पुराणी पार्टी को कोसा था ,निंदा की ,अपमान किया था  पर सफलता की आशा में वे कुछ भी करने को तैयार हैं . वास्तव में चुनाव के समय सभी लोग याने प्रत्याशी दया के पात्र होते हैं या कहें श्रेष्ठ भिखारी होते हैं ,इस समय इतने विनीत ,हीन,कमज़ोर होते हैं कारण बेचारे पराधीन हैं वोटों के लिए ,इसी समय इनकी परीक्षा होती है ये कितने नैतिकतावादी हैं या ईमानदार हैं ,क्या इनका कुल हैं क्या पार्टी हैं और देश को क्या देना चाहते हैं ?बस चुनाव तक उसके बाद फिर ये चौदवी के चाँद हो जाते हैं ,चुनाव के बाद जीतने वाले गिन गिन  कर बदला लेते है जनता से कि आपने हमारे कितने जूते घिसवाए और हाथ जुड़वाएं .और हारने वाला अपनी कमजोरियों के कारण या पार्टी का असहयोग  या भितरघात से हारे.उसके अलावा कितना पैसा खर्च हुआ.तथा आगमी पांच साल के लिए पिछड़ गए  इसका दुःख .इसके कारण जीतने वाले की सब बातें उसे दर्दनीय और असहनीय लगती हैं ,उसका सम्मान होने पर इनकी छाती पर सांप लोट जाता हैं .यदि भाग्यवशात मंत्री  बन गया तो ये जल कर ख़ाक हो जाते हैं ,बिना आग के झुलस जाते हैं .

एक व्यक्ति पञ्च का चुनाव लड़ा ,उसे मात्र दो वोट मिले ,एक तो स्वयं का पर दूसरा किसका ? इस दूसरे वोट के पीछे पूरे वार्ड के लोग आये और कहने लगे मैंने तो अपना  वोट दिया था . हारने वाला चिढ़ कर बोला दूसरा वोट किसने दिया ?उसके पीछे पूरे वार्ड का अहसान लेना पद रहा हैं .

किसी से आदर्श बदला लेना हो तो चार काम दे दो —१ पुराना ट्रक ,टेक्टर ,मशीन २ कोर्ट में मुकदमा .३ चुनाव लड़वा दो और4 आज के परिप्रेक्ष्य में मोबाइल बस वह इन्ही के चक्कर में उलझा रहता  ,जिसके सामने कभी हाथ नहीं जोड़े उसको वोट के लिए बाप मानना पड़ेगा ,और जो रोज नमस्ते करता हैं वह आपको कभी वोट नहीं देगा कारण जलन से कि साला  बड़ा चुनाव जीतने चला .

डॉक्टर अरविन्द जैन प्रान्तीय अध्यक्ष लेखक प्रकोष्ठ एवम शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

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