#Lekh by Dr. Arvind Jain

क्या  संस्कृति और मर्यादा केवल भाषण और किताबों तक सीमित रह गयी ?

यह बात हर युग में उठायी गई थी , हैं और उठायी जाएँगी .वर्तमान सन्दर्भ में इस बात को उठाना आवश्यक हैं या नहीं ? क्या सचमुच हम आधुनिक हो गए ? हम ज्ञानवान हो गए ?हम पूर्ण वैज्ञानिक रूप से विकसित हो गए ?क्या आधुनिक ज्ञान विज्ञानं हमारे सर्वांगीण विकास के लिए पूर्ण हैं ?क्या हमने भौतिक संसाधनों को जुटा कर सुखी हो गए या और दुखी हो गए ?सुख दुःख की मान्यतातएं ख़तम हो गयी . हम पूर्ण तटस्थ हो गए .या जो सामग्री हमें उपलब्ध हैं वे हमें मानसिक संतुष्टि देती हैं ? संस्कृति को जानने की जरुरत आज हमें अधिक हैं  या अमर्यादा में रहना लाभकारी हैं ? ऐसे प्रश्नों की झड़ी बहुत हैं पर बात शुरू करने के पहले भूमिका बनाना जरुरी हैं . क्या आप इससे सहमत हैं या नहीं ?

बात संस्कृति की तो इसकी अपनी अपनी परिभाषाएं कई विद्वानों ने कई तरह से दी हैं .मेरी अपनी मान्यता हैं ,संस्कृति मतलब जो आपको ,औरों को और सबको अच्छा लगे उसे संस्कृति कह सकते हैं . यानी यदि शराब पीना अच्छा हैं तो सबको अच्छा लगना चाहिए .यदि किसी एक को एतराज़ हैं मतलब उसमे कही कुछ कमी या बुराई हैं .यह यदि सर्वमान्य हैं तो विरोध क्यों ? कितने पिता अपने पिता के सामने या पिता पुत्र के सामने इसे अंगीकार करते हैं ? यदि यह अच्छी ,लाभदायक हैं तो फिर एक दूसरे से लिहाज़ या दुराव क्यों ?

इस समय जो शराब ,सिनेमा और सेक्स का वातावरण बना हैं वह कितना उपयोगी हैं जन सामान्य को ? मैं समूह में बात न करके व्यक्तिगत पूछना /जानना चाहता हु. आज ही के  समाचार पत्र में समाचार आया की १९साल के लड़के ने और १७ साल की लड़की ने असफल प्रेम के कारण आत्मा हत्या करली .शायद उनको अच्छा लगा होगा जो सफल हैं .एक पिता ने अपनी बेटी को गर्भवती बनाया .यह शायद दुखद हो सकता हैं . कुछ विद्यार्थी पढ़ने के लिए आये और खर्च की कमी के कारण चोरी करते पकडे गए . कोई प्रेमिका गर्भपात के कारण मर गयी .शायद प्रेमी एक झंझट  से मुक्त .

मर्यादा पर भी चर्चा कर लेना उचित होगा. मर्यादा मतलब सीमित . क्या आप अमर्यादित कार,बाइक चलाते हैं .? क्या आप अनलिमिटेड खाना खाते हैं ?क्यों . यदि मुफ्त का खाना हैं तो असीमित खाओ . क्यों सरकार ,प्राइवेट कंपनी लिमिटेड शब्द का उपयोग करती ? क्यों अनलिमिटेड नहीं बनाती , ? हमें भी अपना जीवन सीमित .मर्यादित रखना चाहिए ,नहीं रखोंगे तो जो हालात अभी बने हैं उससे अधिक दारुन होंगे.

रोग के हेतु में हीन योग ,अति योग और मिथ्यायोग   की बहुत महत्वपुर्ण भूमिका हैं . हम आज तीनो योगों के वशीभूत हैं . हीन यानी कम मतलब अच्छे काम कम करते हैं और बुरे काम अधिक करते हैं और जो काम जिस समय करना चाहिए न करके और गलत ढंग से करना मिथ्यायोग हैं .अब हम अपनी आँख बंद कर स्व चिंतन करे हम कहाँ हैं .?

इस समय आप अपने समाज ,परिवार और पड़ोस को देखे की हम कहाँ जा रहे हैं ?क्या सही दिशा में जा रहे हैं तो फिर हम सब क्यों परेशां हैं ?  कौन इस समय मानसिक ,शारीरिक ,आर्थिक , सामाजिक ,धार्मिक रूप से सुखी हैं .ये सब घटनाएं हताशा ,निराशा की प्रतीक हैं .ये यक्षय प्रश्न हर युग में आये हैं पर हम जिस युग /समय में जी रहे क्या ये उपयुक्त हैं ?, हां हम पूर्व से शिक्षा लेकर ,उनसे प्रेरणा लेकर कुछ अच्छा सीखे . पर हम आज आदर्श के चक्कर में यथार्थ को दरकिनार कर रहे हैं क्या यह ठीक हैं ?

इस सबके साथ सरकार भी दोषी हैं ,हमने गुलामी से मुक्ति पा ली और स्वन्त्र हो गए यहाँ तक ठीक था पर हम स्वछन्द भी  हो गए ,सरकार एक प्रकार से निरीह होकर मूक दर्शक बन गयी कारण सरकार भी संस्कृति और मर्यादा को छोड़ चुकी हैं .क्या सरकार नहीं जानती की टी .वी.सिनेमा ने अमर्यादित होकर अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं किया .इन पर नियंत्रण किसका हैं .? पर सरकार संस्कृति को त्याग चुकी . क्या परोसा जा रहा हैं ,क्या हितकारी हैं क्या उपयोगी हैं इससे कोई सरोकार नहीं हैं . वह धृतराष्ट बन गयी हैं .मुह में राम बगल में छुरी की नीति अपनाती हैं . प्रत्येक क्षण हम अपराध ,शराब ,सेक्स ,आतंकवाद ,हिंसा ,चोरी,झूठ  बलात्कार के द्रश्य देखते हैं .जो देखते हैं फिर उसी का उपयोग करते हैं उसके बाद जब घटना घटती  हैं तो रोना क्यों.?

भौतिकता की चकाचौन्ध ने हमारी जिंदगी को नशा युक्त   कर नाश कर दिया .आज हम क्या देखते हैं ?मात्र चिंता ,तनाव, निराशा ,हताशा , अवसाद जैसे मानसिक रोगों से क्यों ग्रस्त हैं ? इतना विकास होने के बाद ,पैसा ,पद,प्रतिष्ठा  होने के बाद हम कुंठित क्यों हैं ? क्योकि हम प्रतिस्पर्धा ,प्रतिष्ठा और प्रदर्शन के चक्कर मैं उलझ गए हैं . पर ये मत मानेंकी हम अभिमन्यु जैसे चक्रव्यूह मेंफंसे गए निकलने का मार्ग नहीं हैं .है बस कुछ करना होगा होगा .

सबसे पहले हमें अपने आदर्शों को देखकर उनके दिखाए मार्गों पर चलना होगा .मात्र किताबी नहीं व्यावहारिक रूप से और कुछ नशा जीवन में धार्मिकता का लेना होगा .यदि हम राम के आदर्श को ले तो उन्होंने कभी  नहीं कहा की आप इसमार्ग  पर चलो, पर उन्होंने कहा में इस मार्ग से चला और मर्यादा  पुरुषोत्तम बना . इसके लिए संयम से जीने की कला से हम सहज ,स्वथ्यऔर संतुष्ट होंगे और असामयित जीवन जीने से रुग्ण ,असंतुष्ट ,स्वार्थपूर्ण और अंधी मनोवृत्ति   के ही होंगे . हाँ अंत में एक बात और कहना चाहता हूँ की यदि नगर निगम हमें गन्दा पानी प्रदाय करती हैं तो उसका उपयोग क्यों नहीं करते ,हम क्यों शुद्ध साफ़ और उबाल कर पानी का उपयोग करते हैं इसी प्रकार संस्कृति और मर्यादा व्यक्तिगत एक साथ पारिवारिक ,सामाजिक और राष्ट्रीय हैं इसलिए निर्णय आपका है की हम सही दिशा में जा रहे या नहीं. हर सिक्के के दो पहलु हैं हो सकता हैं मेरी बात किसी को अप्रिय लग सकती हैं ,तर्क अनन्त होते हैं .

डॉक्टर अरविन्द जैन प्रान्तीय अध्यक्ष ,लेखक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश  एवम शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

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