#Lekh by Dr.Arvind Jain

सहिष्णुता और अनेकान्तवाद

वर्तमान में भारत में शब्दों के बाणों का इतना अधिक  उपयोग हो रहा जिससे आपसी कलह बढ़ रहा हैं कारण कोई किसी की बात को आदर नहीं देता और सब अपनी अपनी बात पर अड़े हैं और सब सही हैं .जैसे आधा गिलास भरा हैं और आधा खाली हैं .पांच अंधे हाथी को छूकर बताते हैं की यह खम्बा जैसा हैं ,कोई कहता पंख जैसा हैं ,कोई कहता रस्सा जैसा हैं . कोई भारत में यह कहे की यहाँ दिन ही हैं तो अमेरिका में  रात भी  हैं . सापेक्षता का नियम हैं की सबके अपने अपने दृष्टिकोण हैं वे एक की अपेक्षा सही हैं . यदि हमने अपने जीवन में भी (also )की जगह ही (have  to  ) का उपयोग किया तो युध्य शुरू हो जाता हैं . आप भी सही हैं और में भी सही हु एक अपेक्षा से. जैसे conflict  management   में1 i  am  ok ,you  are  not  ok. 2  you  are  ok  ,.i  am  not  ok ,3you  are  not  ok , i  am  not  ok 4  i  am  ok  and  you  are  also  ok  . इतना समझाना और समझना  पर्याप्त हैं .

महामहिम राष्ट्रपति जी ने आज  जो बात कही उससे यह अर्थ निकलता हैं की अशांति और हिंसा की कोई जगह नहीं होना चाहिए भारत में. जब तक एक दूसरे के भावों को सम्मान  नहीं देंगे तब तक यह संभव नहीं हैं . श्री जेटली जी कहते हैं राष्ट्रीयता भारत में  बुरा शब्द हैं और नॅशनलिस्म अच्छा शब्द हैं .वही वेंकैया नायडू कहते हैं अवसरवादी राजनीती का मुख्य मुद्दा आतंकवाद और अलगावबाद के प्रति नरम और nationalism  के प्रति कठोर .आज के समय में अलगावादियों और देशद्राहियों का स्वागत होता हैं और nationalist को खतरा हैं .

आज के सन्दर्भ में राष्ट्रीयता शब्द की जिस प्रकार खींचतान चल रही है उसमे कोई सर्वसम्मत परिभाषा दे पाना तो कठिन है ,किन्तु पूर्वाग्रह मुक्त और विवेकशील मानसिकता के लिए ग्राह्य परिभाषा क्या हो ,यह तो निर्धारित किया ही जा सकता हैं.अनेक विध्यवानों और राष्ट्रीय -चिंतकों ने इस परिप्रेक्ष्य में जो चिंतन किया है या विचार व्यक्त किये हैं ,उनसे यही निष्पन्न होता हैं किअपने देश और देश की सांस्कृतिक -चेतना के साथ रागात्मक तादात्म्य -सम्बन्ध की अप्रतिहत एवम सतत रसानुभूति से ओत-प्रोत  होने का नाम राष्ट्रीयता हैं इस भारत भूमि को अपनी मातृ- भूमि ,पितृ- भूमि ,पुण्य -भूमि और कर्म- भूमि के रूप में उपासता हुआ जो व्यक्ति स्वयं को भारत माता का पुत्र मानता हैं ,जो इस देश के धर्म ,संस्कृति ,अस्मिता और स्वाभिमान की रक्षा -सुरक्षा और परमोत्कर्ष के लिए समर्पण -भाव से सर्वस्य त्याग के लिए तत्पर हैं ,जो भारतीय इतिहास ,परम्परा ,मान -बिंदुओं एवम उपासना केंद्रों के पार्टी श्रद्धावान हैं ,जो वेद उपनिषद ,रामायण -महाभारत ,पुराणों और हिन्दू शास्त्रों केप्रति आस्थावान हैं ,जो समग्र भारतीय वांगमय और दार्शनिक आध्यात्मिक चिंतन धाराका अनुरागी हैं ,जो भारतीय -समाज और भारतीय जन की आशा -आकांक्षायों ,भाव- स्वभाव और सुख दुःख के साथ संवेदनात्मक रूप से एक रस हैं वह राष्ट्रीय है और ऐसी मनोरचना का नाम राष्ट्रीयता हैं .मेरी दृष्टि  में राष्ट्रीयता की  सर्वकष  और व्यापक परिभाषा हैं .

अब यहाँ यह विचारणीय प्रश्न हैं की क्या कोई राजनैतिक पार्टी या उनकी विचारधारा के छात्र वर्ग इतना व्यापक चिंतन के साथ आपस में बैठकर बात कर सकते है  या इस बिंदु पर एक हो सकते हैं .मात्र चिल्लाने से राष्ट्रीयता नहीं आने वाली .इस हिसाब से सब देश द्रोही की स्थिति में अपराधी हैं . क्यों नहीं संकीर्ण मान्सिक्ताता से ऊपर उठ कर काम करे.सब पार्टियों का लक्ष्य देश में शासन चलाना और  लोक कल्याणकारी काम करना और विडम्बना यह हैं की कोई भी पार्टी एक दूसरे के साथ न बैठना  चाहती और न दूसरी पार्टी  के भावों को आदर देती हैं .जब उनमे भाई चारा नहीं हैं तब क्यों वसुदैव कुटुम्बकम   की बात क्यों करते हैं .इससे साफ़ सिद्ध होता हैं की इनके हठी के दांत खाने  के और दिखने के और.

वर्तमान में हमारे राष्ट नेताओं के प्रजातंत्र की ऐसे धज्जियाँ उड़ाई है जो अकल्पनीय हैं .आज ऐसे लड़ रहे हैं जैसे चक्रवर्ती बनना हो और अश्वमेघ यज्ञ   में  अपने प्राणों  की आहुति देना हो . इस समय कहाँ ,किसको राष्ट्र प्रेम दिखाई दे रहा हैं सब अपने स्वार्थ की पूर्ती के लिए सबको तिरस्कृत कर रहे हैं .कोई में भी भाई चारा नहीं हैं .ऐसे लड़ रहे हैं जैसे दुश्मन या विरोधी राष्ट्रों से लड़ रहे हैं ,कितनी भावों की हिंसा कर रहे हैं ,कितना कितना दूसरों को लज़्ज़ित कर रहे हैं .कितना झूठ ,पाखण्ड का सहारा ले रहे  हैं कितनी कुटिलता ,फरेब का सहारा लेकर विजय श्री पाना चाहते हैं .इसीलिए इन कारणों से राजा नरकगामी  होता हैं .कितना कष्ट उठाकर पद पाना चाहते हैं .और अंत में कुछ नहीं जाना हैं तो कम से कम इतना बैर तो न रखो की कोई अंतिम समय कन्धा तक न देने आये प्रसन्नता से.

एक बात और कहनी है कि हमें

कि

पदवाले ही पदोपलब्धि हेतु

पर को पद -दलित करते है ,

पाप -पाखंड करते हैं .

प्रभु से प्रार्थना है कि

अपद ही  बने रहे हम !

जितने भी पद है

वह विपदाओं के आस्पद हैं ,

पद -लिप्सा का विषधर वह

भविष्य में भी हमें न सूंघे

बस यही भावना है ,विभो !’

कृपया पढ़े ,गुने और समझे .

डॉक्टर अरविन्द जैन प्रानत्तेय अध्यक्ष लेखक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश एवम शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

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