#Lekh by Dr. Arvind Jain

अमेरिका  स्वर्ग या नरक —-डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल –

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हर व्यक्ति अपने घर को अपना घर कहता हैं जब तक वह अपने परिवार से न्यारा /अलग न हो जाये. उसके बाद उसे अपना स्वयं का घर, घर लगता हैं और जहाँ से अलग हो जाता हैं तो वह घर उसे घर जैसा लगता हैं .जैसे बहु को सास कहती हैं कि हमारी बहु ,हमारी लड़की जैसी हैं ,लड़की नहीं .इसी प्रकार home और house   में अंतर हैं . home अपना स्वयं का घर या मकान या गृह होता हैं जबकि house किराये का मकान होता हैं ,गेस्ट हॉउस,रेस्ट हॉउस ,सर्किट हॉउस जहाँ हमारा स्वामित्व नहीं होता.

प्राचीन कहावत या सुभाषित हैं परदेश कि भूमि से अपनी देश कि भूमि अधिक गौरवशाली होती हैं . स्वर्ग के नौकर से नरक का राजा अच्छा होता हैं ,कम से कम नरक में राजा जैसा तो रहता हैं  पर स्वर्ग में नौकर या चपरासी की अपेक्षा .बात आज कल चलरही हैं नस्ली हिंसा की .यदि यह हिंसा राजा के द्वारा होती तो चिंतनीय पर जब जनता /प्रजा आपसे घृणा करने लगे तो मानकर चले आप अपने आप में सुरक्षित नहीं हैं .

हमारे देश को इस परिस्थिति में लाने का श्रेय किसको हैं ? सोचे . वो है पृथ्वीराज चौहान को यदि उन्होंने संयोगिता का स्वयंवर न किया होता और न जयचंद ने मोहम्मद गौरी का न बुलाया होता तो शायद यह स्थिति न बनी होती .खैर हमारा खून गुलामी से सराबोर हैं .हमें गुलामी का जीवन पसंद हैं .हमारी नसों में गुलामी का खून अभी भी दौड़ रहा हैं और कब तक बहेगा नहीं मालूम ? प्राचीन काल में भी हमारे देश के व्यापारी व्यापार करने  विदेश जाते थे और फिर वापिस आ जाते थे.

शिक्षा के कारण हमने सूचना तंत्र को अपना ज्ञान मान लिया और वह भी अधूरा. फिर डिग्री लेकर अधिक विकास करने परदेश गए .विकास किसका ? अपना ,परिवार का ,देश का . स्वाभाविक पहले स्वयं ,फिर परिवार और अंत में देश का.स्वन्त्रता के पहले स्वन्त्रता संग्राम लड़ने वाले पहले देश ,फिर परिवार और उसके बाद खुद का स्वार्थ देखते थे. हम अमेरिका में सैकड़ों वर्षों से बसते जा रहे हैं और वह जाकर हम सम्रद्ध हो गए जिस प्रकार अँगरेज़ हमारे देश में आये थे ,व्यापार किया फिर राज्य किया. यही भाव अमेरिकन को शायद होने लगे. उनको लगा शायद भारतीय भी अंग्रेजों जैसे हमारे  देश में पाँव जमाकर हमारे ऊपर राज्य करेंगे तथा ये आखिर हैं तो परदेशी चाहे आपने वहाँ की नागरिकता क्यों न ली हों ? यह बात छिपी और छुपी हैं . क्या कोई भी अपने देश में बाहरी व्यक्ति को सम्रद्ध होते देख सकता हैं ?क्या आप पसंद करते हैं ?हमारे देश में भी प्रदेश स्तर पर ये भाव आते हैं जबकि हम पूर्ण रूप से भारतीय हैं .क्या हम अपने पडोसी को सम्पन्न देखना पसंद करते हैं ?  वैसे हमने धन और भौतिक संसाधनों को अपनी विकास और प्रगति का सूचक माना. और अधिक धन का संचय दुःख का कारन हैं और धन खून को  खून से अलग कर देता हैं .एक दूसरे के दुश्मन हो जाते हैं और इसी धन के कारण या भौतिक सुविद्याओँ  के कारण हमारे पडोसी चाहे पाकिस्तान हो या चीन हो या कोई और हो परस्पर स्पर्धा के कारण दुखी हैं और दुश्मन हैं ,जबकि धन ,सुख सुविधाएं अपने अपने पूण्य पाप से आती हैं .यदि आपको सुख मिलना होगा तो चाहे अमेरिका में रहो ,चाहे मुम्बई रहो या कोई गांव में .या महल में या झोपड़ी में .नहीं मिलना हैं तो राष्ट्रपति भवन में रहकर आप सुखाभास प्राप्त कर सकते हैं . वास्तविक सुख तो अध्यात्म में हैं जो हमें नैतिक के साथ मानसिक शांति देती हैं आखिर हमारा लक्ष्य क्या होता हैं ? सुख शांति से अपना जीवन यापन करे .पर धन कमाने के चक्कर में हम अपने माँ बाप नाते रिश्तेदारों से दूर और वहां आप दोयम दर्ज़े के नागरिक हैं ,आप कहेंगे यहाँ हमारा house  हैं home  नहीं.

हम अपने देश में भी अप्रवासी भारतीय कहलाते हैं .यहाँ से गए काम से. यह विचारणीय बिंदु हैं ,अमेरिका और विकसित देशों में हमें काम के बहुत अवसर मिलते हैं .अपने ज्ञान  की क़द्र होती हैं और धन ,यश सब कुछ मिलता हैं पर आंतरिक भय से मुक्त नहीं ऐसा क्यो ? वहाँ विकास किअधिक संभावना हैं ,क्या हमारे देश में नहीं हैं क्या? यदि ऐसा हो जाए की वर्तमान शासक कटिबद्ध हो जाये तो हमें पलायन करना होगा .उनका विकास रुक जाए उसकी उन्हें परवाह नहीं तब क्या करेंगे .जैसे हम कहते हैं यदि पेट्रोल ख़तम हो जाये तो भविष्य कैसा होगा ?

वसुदैव कुटुम्बकम की सोच ख़तम होने जा रही हैं मिडिल ईस्ट और अन्य देशों में लड़ाइयां खून के प्यासे के  तौर पर लड़ी जा रही हैं .अमेरिका वासियों के मन में घ्रणा के भाव आगये . इसको रोकना और कितनी सफलता मिलेंगी यह तो भविष्य के गर्त में छिपा हैं .पर वर्तमान में स्थिति चिंतनीय हैं . हमें मामूम हैं अमेरिका कुशल ,होनहार और ज्ञान के क्षेत्र में उतना सम्रद्ध नहीं हैं ,वहाँ का अधिकांश काम बाह्य दुनिया के लोग कर रहे हैं पर जलन ,घ्रणा का कोई इलाज़ नहीं हैं .प्रभावी वही होगा जिस पर बीतेंगी .कब  कौन किसकी चपेट में आएंगे नहीं मालूम?..बहुत चिंतनीय विषय है जबकि वहाँ सिरफिरा शासक हैं .  हर व्यक्ति के अपने अपने विचार और सोच होती   हैं .यह सोच भी हो सकती हैं अमेरिकन की .

डॉक्टर अरविन्द जैन प्रान्तीय अध्यक्ष लेखक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश एवम शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

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